Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
2 इतिहास 1 2 इतिहास 2 2 इतिहास 3 2 इतिहास 4 2 इतिहास 5 2 इतिहास 6 2 इतिहास 7 2 इतिहास 8 2 इतिहास 9 2 इतिहास 10 2 इतिहास 11 2 इतिहास 12 2 इतिहास 13 2 इतिहास 14 2 इतिहास 15 2 इतिहास 16 2 इतिहास 17 2 इतिहास 18 2 इतिहास 19 2 इतिहास 20 2 इतिहास 21 2 इतिहास 22 2 इतिहास 23 2 इतिहास 24 2 इतिहास 25 2 इतिहास 26 2 इतिहास 27 2 इतिहास 28 2 इतिहास 29 2 इतिहास 30 2 इतिहास 31 2 इतिहास 32 2 इतिहास 33 2 इतिहास 34 2 इतिहास 35 2 इतिहास 36Verse
2 इतिहास 30:1 2 इतिहास 30:2 2 इतिहास 30:3 2 इतिहास 30:4 2 इतिहास 30:5 2 इतिहास 30:6 2 इतिहास 30:7 2 इतिहास 30:8 2 इतिहास 30:9 2 इतिहास 30:10 2 इतिहास 30:11 2 इतिहास 30:12 2 इतिहास 30:13 2 इतिहास 30:14 2 इतिहास 30:15 2 इतिहास 30:16 2 इतिहास 30:17 2 इतिहास 30:18 2 इतिहास 30:19 2 इतिहास 30:20 2 इतिहास 30:21 2 इतिहास 30:22 2 इतिहास 30:23 2 इतिहास 30:24 2 इतिहास 30:25 2 इतिहास 30:26 2 इतिहास 30:27



वाक्य का सीधे अर्थ
यह वाक्य बताता है कि राजा, उसके अधिकारी और यरूशलेम के नागरिकों ने फसह का उत्सव एक वर्ष के भीतर नहीं, बल्कि दूसरे महीने में मनाने की सहमति दी।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
2 इतिहास 30 अध्याय में ईश्वरीय उत्सवों के आयोजन की व्यवस्था का पुनःस्थापनण दिखाया गया है। आयत 2 में यह दर्शाया गया है कि बीमारी, यात्रा या अन्य बाधाओं के कारण कुछ परिवार लौटे या असमर्थ रहे, इसलिए समुदाय ने विकल्प के रूप में फसह को अगले महीने मनाने का निर्णय किया ताकि सभी के लिए अवसर बना रहे। यह निर्णय सामुदायिक एकता और धर्मप्रियता के मूल्य को संकेतक करता है कि भगवान की महिमा के लिए बाधाओं के बावजूद भी प्रार्थना और उपासना का मार्ग खुला रखा गया।
व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ
संक्षिप्त थीमैटिक सूची
संबद्ध पवित्र पाठ
Cross-reference 1: इतिहास 28:21 — राजाओं के निर्णयों में विधि-संरचना के महत्व को दर्शाता है कि कैसे निर्णय प्रक्रिया में विशेषज्ञता और समुदाय की भागीदारी जरूरी है।
Cross-reference 2: लेखक 6:6 — एकता और दायित्व के बजाय एकजुटता की आवश्यकता को रेखांकित करता है ताकि सेवक के संदेश स्पष्ट रहे।
Cross-reference 3: यहोशू 5:10-12 — नए महीने में फसल-संरक्षण के साथ यह भी दिखे कि पवित्रताओं के साथ अवसर बनते हैं।
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि उपासना के अवसरों में समय और परिस्थिति के अनुरूप ढील या परिवर्तन समाजिक-धार्मिक जीवन का सामान्य हिस्सा है, ताकि परमेश्वर के प्रति आस्था स्थिर रहे।
व्यावहारिक निष्कर्ष
जो सामाजिक-धार्मिक निर्णय होते हैं, उनमें सामुदायिक एकता और दया-भाव जरूरी है। समय-सीमा और परिस्थिति के अनुसार व्यवस्था में लचीलापन रखना, प्रेरित उपासना के लक्ष्य को आगे बढ़ाता है। हर व्यक्ति के लिए अवसर बनना परमेश्वर के प्रेम की संकेतक है।