यूहन्ना 1:1 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

आदि में* वचन था, और वचन परमेश्‍वर के साथ था, और वचन परमेश्‍वर था।

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यूहन्ना 1:1 पद-दर-पद बाइबल टीका

यूहन्ना 1:1 — प्रारम्भ में वचन

ईसूख के आगमन से पहले का समय: यहाँ संदर्भ देता है कि आदि में वचन था। यह पंक्ति ईश्वर के साथ अनंत संबंध और ईश्वर होने की घोषणा को उद्घाटन करती है। भगवान के रवैये और प्रकृति को यह बताती है कि वचन स्वयं परमेश्वर है और परमेश्वर के साथ है।

वचन क्या बताता है — ईश्वर-विश्वास की गहराई

यह वचन दर्शाता है कि ईश्वर और वचन का सम्बन्ध एक अद्वितीय एकता में है: वचन परमेश्वर के साथ था और वही परमेश्वर था। यह उद्धार-योजना के केंद्रीय तत्त्व को प्रकट करता है कि ब्रह्मांड के सृजन और जीवन का स्रोत परमेश्वर ही है, और वह अपने तर्कपूर्ण व्यक्त रूप – वचन के रूप में, मानव इतिहास में प्रवेश कर रहा है।

महत्वपूर्ण शब्दों और चित्रों की clarification

  • : यहाँ “वचन” ब्रह्मांड की प्रभुता, सोच-विचार और सृजन-कार्यक्षमता का उल्लेख करता है—जो परमेश्वर के साथ और परमेश्वर के रूप में मौजूद है। यह वचन बाद में मसीह यीशु के अवतार से जुड़कर मिड-हिस्ट्री में प्रकाशित होता है।
  • : यह रिश्तेदारी दिखाती है कि वचन परमेश्वर के साथ रहता है—उनके समान उद्देश्य और स्वीकृति में एकता।
  • : यह बताता है कि ईश्वर अपने क्रियात्मक आत्मा-स्वरूप में प्रकट होता है; यह एक आध्यात्मिक-गुणात्मक उद्घोषणा है कि ईश्वर के स्वभाव और उसकी प्रकटता एक हैं।

संबंधित पवित्रशास्त्र संदर्भ

आस्ति-चरित्र में से कुछ स्थान जो समान विचार रखते हैं:

  • यूहन्ना 1:14— वचन मनुष्यों के बीच आकर लोगों के बीच निवास किया; यह वचन अपने दिसा-उत्पत्ति और मसीह के अवतार पर स्पष्ट करता है।
  • यीशु मसीह के चर्चित कथन— मसीह अपने लोगां के बीच ज्योति और जीवन के स्रोत के रूप में प्रस्तुत हुए।
  • I कुरिन्थियों 8:6— एक ईश्वर, एक प्रभु, और एक वचन के विचार को पुख्ता करता है कि सारे पदार्थ-परमेश्वर एक ही सत्ता से निकलते हैं।

इन संदर्भों के भाव एक दूसरे से जुड़ते हैं: वचन की उत्पत्ति, उसका मानव-उत्पत्ति के साथ अंतरंग संबंध और उद्धार-योजना में उसकी केंद्रीय भूमिका।

आज के दिन के लिए आवेदन

हम कैसे इस उद्घोषणा को आज के जीवन में लाते हैं? पहले, ईश्वर की सत्ता और प्रेम के स्रोत के रूप में वचन की सत्ता पर भरोसा दें। दूसरे, अपने जीवन में भगवान के साथ “वचन-परिपूर्णता” का लक्ष्य रखें—यानी सच बोलना, नैतिकता और प्रेम-आचरण में एकत्व बनाये रखना। तीसरे, संसार में जो कुछ भी होता है, उसे ईश्वर की योजना और परमेश्वर के वचन के प्रकाश में देखने की प्रवृत्ति विकसित करें।

संक्षिप्त समेकन

कुल मिलाकर, यह पाठ यह साफ करता है कि आदि से वचन परमेश्वर के साथ था और वही परमेश्वर है। यह मसीह के अवतार के लिए पूर्व-सूचना है, जिससे विश्वासियों में ईश्वर-आस्था की गहराई और उद्धार की आशा मजबूत होती है।

उद्धरण-टिप्पणी: Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन विचारों से संकलित प्रमुख बिंदु नीचे समाहित हैं (कृपया ध्यान दें कि यहाँ उनके पूर्ण उद्धरण नहीं दिए गए हैं, बल्कि उनके विचारों के सार शामिल हैं):

  • Henry का विचार: वचन की अद्वितीयता और ईश्वर के साथ उसकी संयुक्त अस्तित्वता पर बल दिया गया है—यह जीवन की शुरुआत के लिए आधार है।
  • Barnes की टिप्पणी: वचन को परमेश्वर के साथ एक और परमेश्वर के रूप में देखने की ठोस व्याख्या प्रस्तुत करती है।
  • Clarke का तुलनात्मक दृष्टिकोण: वचन-आत्मा के संगत अर्थों पर प्रकाश डालता है कि यह दिव्य-प्रकटता का मूल है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यूहन्ना 1:1 समानांतर पद और संबंधित वचन

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आदि में परमेश्‍वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की। (इब्रा. 1:10, इब्रा. 11:3)

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और अब, हे पिता, तू अपने साथ मेरी महिमा उस महिमा से कर जो जगत की सृष्टि पहले, मेरी तेरे साथ थी।

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वह लहू में डुबोया हुआ वस्त्र पहने है, और उसका नाम ‘परमेश्‍वर का वचन’ है।

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