2 इतिहास 31:6 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

जो इस्राएली और यहूदी, यहूदा के नगरों में रहते थे, वे भी बैलों और भेड़-बकरियों का दशमांश, और उन पवित्र वस्तुओं का दशमांश, जो उनके परमेश्‍वर यहोवा के निमित्त पवित्र की गई थीं, लाकर ढेर-ढेर करके रखने लगे।

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2 इतिहास 31:6 पद-दर-पद बाइबल टीका

2 इतिहास 31:6 का अर्थ और संदर्भ

इस आयत में लिखा है कि जो इस्रएली और यहूदी, यहूदा के नगरों में रहते थे, वे बैलों और भेड़-बकरियों का दशमांश, और उन पवित्र वस्तुओं का दशमांश लाकर रखते थे जो परमेश्वर यहोवा के निमित्त पवित्र की गई थीं। यह भागातीत समय है जब यहूदियों ने राजा हिजकियाह के सुधारों के प्रभाव को मजबूत किया और परमेश्वर के विधान के अनुसार वस्तुओं के दशमांश को व्यवस्थित करना शुरू किया। दशमांश का निर्धारण धर्मीय और सामाजिक व्यवस्था दोनों को स्थिर करता है: यहं्रद्ध भौतिक संसाधन परमेश्वर के धर्मकार्य में लगते थे और नगरों में रहने वाले लोग भी इस व्यवस्था से जुड़ते थे।

मुख्य समझ

यह verse यह दर्शाता है कि धर्म-लाभ और लोक-कल्याण के लिए दशमांश की प्रणाली किस प्रकार व्यवहार में लाई गई। लोग न केवल स्वयं अंश देते थे, बल्कि वे पवित्र वस्तुओं को भी जमा कर देते थे ताकि मंदिर-समारोह, सेवकों के भोजन और धार्मिक आवश्यकताओं के लिए प्रयुक्त हों। यह संस्था इस्राएली समुदाय में एकता और व्यवस्था बनाती है, जिसमें हर नगर का निवासी भागीदारी कर रहा है और परमेश्वर के मंदिर की सेवाओं के लिए संसाधन सुनिश्चित हो रहे थे।

मुख्य थीम

  • आस्था व उत्तरदायित्व: दशमांश देना एक बयान है कि आर्थिक उपार्जन परमेश्वर के अधिकार क्षेत्र और योजना का हिस्सा है।
  • पवित्रता और सेवा: पवित्र वस्तुओं का दशमांश समर्पण से पवित्रता को बनाए रखना है और परमेश्वर के लिए स्वयं को आह्वानित करना है।
  • समुदायिक एकता: नगरों के रहने वालों का सहभागी होना समुदाय की कुल व्यवस्था को बल देता है और धार्मिक कार्यों के टिकाऊ स्रोत बनाता है।

संबंधित आयते

- व्यवस्थात्मक दशमांश का सिद्धांत 14:19-29 और 28:30-32 की परंपरा से जुड़ता है, जिसमें यहूदियों ने देश-योजना के भीतर दान और वस्तुओं के वितरण को सम्यक बनाते देखा है।

- यहूदा के नगरों में दशमांश अर्पण से मंदिर के लिए आरक्षित सामग्री और भोजन उपलब्ध होता था, जो पवित्र सेवकगण और धार्मिक समारोहों के संचालन में सहायक था।

- अन्य अध्यायों में दिए गए दशमांश-प्रणालियों से यह स्पष्ट है कि यह व्यवस्था सामाजिक-आर्थिक स्थिरता और सामुदायिक भागीदारी का साधन थी।

व्यावहारिक दृष्टिकोण

इस verse से आधुनिक पाठक सीख लेते हैं कि धर्म और समाज एक साथ चलते हैं। हमारा मामूली दान भी समुदाय की सेवाओं को स्थिर बनाता है—चाहे वह चर्च के समरूप तंत्र हो, या दान-व्यय के सत्यापन के माध्यम से नैतिक प्रगति। साथ ही, पवित्र वस्तुओं के समर्पण का विचार बताता है कि हम अपनी समृद्धि को कैसे परमेश्वर की सेवा के लिए अर्पित करें, ताकि उसकी महिमा बढ़े।

क्रॉस-रेफरेंसेस

1) रोम 12:13 – प्रेम और सहायता के लिए भंडारों का साझा करना; यह दर्शाता है कि संसाधनों को समुदाय की भलाई में लगाना एक जाता-यात्रा है।

2) माला 3:10 – दशमांश की व्यवस्था का आध्यात्मिक महत्व, जिसमें परमेश्वर के चरणों में देने से आशीषें मिलती हैं।

3) 2 कुरिन्थ 9:7 – आनंदपूर्वक और स्वेच्छाय दशमांश देना, ताकि दिल से दी गई आस्था प्रतिष्ठित हो।

संक्षेप

2 इतिहास 31:6 ऐसे समय की घोषणा करता है जब यहूदियों ने दशमांश और पवित्र वस्तुओं के समर्पण को व्यवस्थित किया। यह व्यवस्था एक मजबूत समुदाय, धार्मिक सेवाओं के सतत संचालन और परमेश्वर के लिए समर्पण की संयुक्तStrength को दर्शाती है।

नोट: आवश्यकता हो तो Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के प्रकाशित टिप्पणियों से सीधे शब्दों के छोटे उद्धरण उपलब्ध हैं; इनमें से मूल ब्रह्मवाक्यों के छोटे टुकड़े ऊपर उद्धृत नहीं किए गए, केवल उनके विचारों के सार ग्रहण से प्रस्तुत किए गए हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

2 इतिहास 31:6 समानांतर पद और संबंधित वचन

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“फिर भूमि की उपज का सारा दशमांश, चाहे वह भूमि का बीज हो चाहे वृक्ष का फल, वह यहोवा ही का है; वह यहोवा के लिये पवित्र ठहरे। (मत्ती 23:23, लूका 11:42)

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“तीन-तीन वर्ष के बीतने पर तीसरे वर्ष की उपज का सारा दशमांश निकालकर अपने फाटकों के भीतर इकट्ठा कर रखना;

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लेवियों के बाद इस्राएल के सब गोत्रों में से जितने मन लगाकर इस्राएल के परमेश्‍वर यहोवा के खोजी थे वे अपने पितरों के परमेश्‍वर यहोवा को बलि चढ़ाने के लिये यरूशलेम को आए।

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