Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
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2 इतिहास 17:16 — immediate setting
यह वचन इस प्रकार के ऐतिहासिक घटनाक्रम के बीच आता है जहाँ यहूदा के राजा यहोशफात के प्रशासन के अंतर्गत देश-भर के प्रमुख राजाओं के साथ परमेश्वर की आज्ञाओं की पालना और आराधना के पुनर्जीवन का सिलसिला चल रहा था। इस पद के ठीक पहले नीति-निष्ठ शासन और युद्ध-योग्यता के संदर्भों के बावजूद, यहाँ जिक्री के पुत्र अमस्याह का उल्लेख आता है—जो अपने मन के अनुसार यहोवा को अर्पण करने का प्रयास कर रहा था, परन्तु उसकी आज्ञा-पालन की गहराई शंका और आत्म-स्वार्थ से प्रभावित दिखती है।
धर्मशास्त्र का पाठ और विश्वास पर उसका संकेत
यह पाठ यह स्पष्ट करता है कि परमेश्वर के साथ निष्ठा केवल बाहरी कर्मों या सामुदायिक धार्मिकता पर नहीं मापा जाता, बल्कि दिल की आस्थाओं और प्रेरणाओं पर मापा जाता है। अमस्याह की भूमिका संकेत देती है कि राजा होने के नाते उसे यहोवा की आज्ञाओं के पालन में सावधानी बरतनी चाहिए थी, परंतु सत्ता के कारण वह अपने मन की इच्छाओं को सर्वोपरि मान रहा था। इसका कटाक्ष यह है कि प्रभावशाली जीवनचर्या भी यदि परमेश्वर के निर्देशों से भटक जाए, तो वह आत्म-उत्पादन और आत्म-स्वार्थ को बढ़ावा देता है।
महत्वपूर्ण शब्दों और imagery की स्पष्टता
सेमी-सम्बन्धी अन्य आयातित पंक्तियाँ
— यह पाठ इसी खंड में दो अन्य प्रमुख विचारों से जुड़ता है: पहला, परमेश्वर की आज्ञाओं के पालन में कड़े नियम और दूसरा, नीति-नियमन के भीतर सच्चे दिल की महत्ता।
क्रॉस-रेफरेंसे:
1) 2 इतिहास 17:16 के समान विचार को संदर्भित करते हुए अन्य स्थान यह दिखाते हैं कि बाहरी बल के बजाय हृदय की निष्ठा परमेश्वर के लिए अधिक मूल्यवान है।
2) भजन 51 की आत्म-त्याग और दिल की सच्चाई पर बल देता है कि परमेश्वर कृपा से पहले, दिल की सौम्यता और प्रत्यक्षता चाहिए।
3) यशाय 1:11-17 में वर्णित है कि परमेश्वर केवल धार्मिक क्रियाओं से प्रसन्न नहीं होता; वह मन की निष्कपटता और न्याय की इच्छा करता है।
आज के लिए प्रायोगिक निष्कर्ष
- हमारा धर्म-काम केवल बाहरी दिखावे तक सीमित न रहे। हमारे विचार, प्राथमिकताएं और निर्णय यह दर्शाएँ कि हम सच में परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पित हैं।
- सत्ता या प्रभाव के चलते आचरण में ढील न दें; निष्ठा वह धुरी है जो विश्वास को जीवित रखती है।
- प्रतिदिन के कदमों में सूक्ष्मता, नम्रता और आत्म-चिन्तन आवश्यक है ताकि हम अपने स्वार्थ से ऊपर होकर ईश्वर की राह चुन सकें।
मैथ्यू हेनरी, Albert Barnes, Adam Clarke के सीधे उद्धरण आवश्यक हों तो मैं उपलब्ध समान विचारों के छोटे-छोटे अंश दे सकता हूँ (यदि उपलब्ध हों)।