Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
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यात्रा-संदेश का संक्षेप: 2 इतिहास 33:3
सीधे अर्थ का उद्घाटन: उसने उन ऊँचे स्थानों को फिर से बनवाया, जिन्हें उसके पिता हुइज़किय्याह ने तोड़ दिया था; वेदियाँ और अशेरा की मूर्तियाँ बनाईं, और आकाश के सारे गणों को दण्डवत् किया तथा उनकी उपासना करना शुरू किया।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यहज़किय्याह के शासन के बाद योद्धाओं और तानाशाहियों के प्रेरित दौर में उत्तर-दिसा के धार्मिक पथ में भ्रष्टाचार दोबारा उभर सकता है। इस वंशज मशीनरी में मग्न होकर रुनेहमावन ने पुरानी मान्यताओं को फिर से अपने कट्टर आचरण में शामिल किया। इतिहास का यह भाग विशेष रूप से बताते हैं कि क्योंकि राजा ने पवित्र व्यवस्था से दूर जाना शुरू किया, वेदियों, मूर्तियों और आकाशीय प्रतिमाओं की पूजा जैसे कर्मों से राज्य का धार्मिक ढांचा दूर्व-गति से ढह गया।
यहोवा के अनुशासन और कुशलतापूर्वक बचाव की कसौटी में यह observe किया जा सकता है कि हर बार अस्थिरता और कमजोरी में भी धार्मिक पाठों की पुनरुत्थान को रोकना एक स्थायी समाज के लिए आवश्यक है।
interpretive observations
कथन-विधेयक (Themes)
अन्य क्रॉस-रेफरेंसेज (संयुक्त explanations)
1) 2 इतिहास 28:24-25: राजा की नयी पूजा-योजना कैसे सामाजिक पतन का कारण बनी, यह संकेत करता है कि आध्यात्मिक नेतृत्व के अभाव में राजकीय निर्णय भी भ्रष्ट हो जाते हैं।
2) 2 इतिहास 33:1-2: मनुष्यों के हृदय में ईश्वर-भक्ति बनाये रखना कितना कठिन है, जब पुत्र-राजा सत्ता से प्रभावित होता है।
3) 2 धर्मी 12:5-6: ईश्वर-निष्ठा के नुकसान पर कैसे वह समयीन दण्ड और सुधार के पथ खोलते हैं
व्यावहारिक निष्कर्ष
देश और समुदाय के लिये यह सीख है कि धार्मिक जीवन की संस्थाओं में निरंतर सत्य और संस्थापना आवश्यक है। आस्था के मूल में एक साफ़-सुथरी भक्ति और सामाजिक नैतिकता हो, ताकि सत्ता के दबाव में भी पवित्र नियम न टूटें।
संक्षेपित निष्कर्ष
यह अध्याय दिखाता है कि सत्ता के रास्ते में अगर पूर्ववत् देव-पूजा और मूर्तिपूजा लौट आए, तो समाज में संस्कार और चरित्र क्षीण होते हैं। परमेश्वर की शिक्षा-प्रणाली में स्थायित्व वही है जो प्रेरणा, अनुशासन और सच्ची भक्ति को बनाए रखे।