Old Testament
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प्रेरितों के काम 1 प्रेरितों के काम 2 प्रेरितों के काम 3 प्रेरितों के काम 4 प्रेरितों के काम 5 प्रेरितों के काम 6 प्रेरितों के काम 7 प्रेरितों के काम 8 प्रेरितों के काम 9 प्रेरितों के काम 10 प्रेरितों के काम 11 प्रेरितों के काम 12 प्रेरितों के काम 13 प्रेरितों के काम 14 प्रेरितों के काम 15 प्रेरितों के काम 16 प्रेरितों के काम 17 प्रेरितों के काम 18 प्रेरितों के काम 19 प्रेरितों के काम 20 प्रेरितों के काम 21 प्रेरितों के काम 22 प्रेरितों के काम 23 प्रेरितों के काम 24 प्रेरितों के काम 25 प्रेरितों के काम 26 प्रेरितों के काम 27 प्रेरितों के काम 28Verse
प्रेरितों के काम 16:1 प्रेरितों के काम 16:2 प्रेरितों के काम 16:3 प्रेरितों के काम 16:4 प्रेरितों के काम 16:5 प्रेरितों के काम 16:6 प्रेरितों के काम 16:7 प्रेरितों के काम 16:8 प्रेरितों के काम 16:9 प्रेरितों के काम 16:10 प्रेरितों के काम 16:11 प्रेरितों के काम 16:12 प्रेरितों के काम 16:13 प्रेरितों के काम 16:14 प्रेरितों के काम 16:15 प्रेरितों के काम 16:16 प्रेरितों के काम 16:17 प्रेरितों के काम 16:18 प्रेरितों के काम 16:19 प्रेरितों के काम 16:20 प्रेरितों के काम 16:21 प्रेरितों के काम 16:22 प्रेरितों के काम 16:23 प्रेरितों के काम 16:24 प्रेरितों के काम 16:25 प्रेरितों के काम 16:26 प्रेरितों के काम 16:27 प्रेरितों के काम 16:28 प्रेरितों के काम 16:29 प्रेरितों के काम 16:30 प्रेरितों के काम 16:31 प्रेरितों के काम 16:32 प्रेरितों के काम 16:33 प्रेरितों के काम 16:34 प्रेरितों के काम 16:35 प्रेरितों के काम 16:36 प्रेरितों के काम 16:37 प्रेरितों के काम 16:38 प्रेरितों के काम 16:39 प्रेरितों के काम 16:40



प्रेरितों के काम 16:15 परesity मुख्य विचार
यह श्लोक हमें दिखाता है कि ईश्वरीय कृपा कैसे सामर्थ्यपूर्ण रूप से परिवार, घर और सामाजिक संबंधों में क्रिया करती है। पत्तितुल्य यातनाओं या सामाजिक सीमाओं के बीच भी प्रभु की विश्वासशील से संपर्क बनता है, और परिणामस्वरूप एक घर में चर्च-जीवन आरम्भ होता है। पलायन नहीं, बल्कि domu-आत्मा का निवास बनता है जब व्यक्ति ईश्वर की कृपा से परिपूर्ण हो कर अपने घर को भी पवित्र कर देता है।
साहित्यिक संदर्भ के अनुसार पठन-पथ
यह पद फितेह के निकट की घटना का भाग है, जहाँ लूसी, लुदिया, और उनके घर के लोग प्रभु में विश्वास करते हैं। बपतिस्मा ग्रहण करना और अपने घर में अतिथि-सत्कार देना एक संयुक्त मोड़ है जिससे परिवार-जीवन और चर्च-जीवन एक साथ उभरते हैं। यह दिखाता है कि प्रभु की रीति-नीति एक व्यक्तिगत निर्णय से आगे बढ़कर सामाजिक-परिवारिक दायित्व में प्रवेश करती है।
theological significance (धार्मिक महत्त्व)
धार्मिक रूप से यह उद्धार की माँग से आगे बढ़कर एक सामाजिक-घरेलू परिवर्तन का संकेत है—घर-परिवार का पवित्रता-घर बनना।ുബ यह बतलाता है कि ईश्वर के राज्य का प्रसार निजी विश्वास से शुरू होकर अनिवार्यतः समुदाय-जीवन में प्रवेश पाता है।
प्रमुख उद्धरण से संकेत
महत्वपूर्ण विचार: शुरुआती पंक्ति बताती है कि उसने अपने घराने समेत बपतिस्मा लिया, जो यह दर्शाता है कि सुरक्षा, विश्वास और प्रतिबद्धता घर तक फैली।
लेखन-संदेश — कुछ पुराने टिप्पणीकारों के शब्दों में: “जब परिवार ने विश्वास ग्रहण किया, तो चर्च की प्राथमिकता और घर का आंतरिक धर्म एक साथ पुनर्निर्माण हुआ।”
पवित्रशास्त्र-कोर्स (cross-references) और उनका संक्षिप्त तात्पर्य
नोट: यदि आप उपरोक्त संदर्भों से उद्धरण चाहते हैं, तो मूल शास्त्र-टेक्स्ट को देखने पर वे पाठ का संपूर्ण भाग नहीं देते।
वाचन के लिए प्रश्न ( reflection questions )
संक्षिप्त निष्कर्ष
यह पद दर्शाता है कि विश्वास केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, वह घर-परिवार के दायरे तक प्रविष्ट होकर सामाजिक-धार्मिक जीवन को एक साथ संजो देता है। प्रभु की कृपा से घर भी एक मिसाल बन सकता है—जहाँ अतिथित्व, विश्वास और समुदाय एक साथ बढ़ते हैं।
उद्धृत पाठक-फुटनोट: इस पंक्ति में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के विशिष्ट उद्धरण उपलब्ध हों तो वे संकुचित शब्दों में नीचे दिए गए हैं:
• यह टिप्पणी 19वीं-सदी के सार्वजनिक-डायरेक्ट टिप्पणियों के अनुरूप है, जिनमें घर के विश्वास की वृद्धि पर बल है।