Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
लैव्यव्यवस्था 1 लैव्यव्यवस्था 2 लैव्यव्यवस्था 3 लैव्यव्यवस्था 4 लैव्यव्यवस्था 5 लैव्यव्यवस्था 6 लैव्यव्यवस्था 7 लैव्यव्यवस्था 8 लैव्यव्यवस्था 9 लैव्यव्यवस्था 10 लैव्यव्यवस्था 11 लैव्यव्यवस्था 12 लैव्यव्यवस्था 13 लैव्यव्यवस्था 14 लैव्यव्यवस्था 15 लैव्यव्यवस्था 16 लैव्यव्यवस्था 17 लैव्यव्यवस्था 18 लैव्यव्यवस्था 19 लैव्यव्यवस्था 20 लैव्यव्यवस्था 21 लैव्यव्यवस्था 22 लैव्यव्यवस्था 23 लैव्यव्यवस्था 24 लैव्यव्यवस्था 25 लैव्यव्यवस्था 26 लैव्यव्यवस्था 27Verse
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आठवें दिन मूसा ने हारून और उसके पुत्रों को बुलाकर क्या कहा और इसका मतलब
सीधे शब्दों में अर्थ लैव्यवस्था 9:1 कहता है कि मरकरी के आठवें दिन मूसा ने पवित्र कार्यों के क्रम को पूर्ण करने के उद्देश्य से हारून और उसके पुत्रों तथा इस्राएली प्रीष्ठकारों (आदरणीय बुजुर्गों) को एकत्रित किया और उनसे कहा कि वे आराधना और बलिदान-संस्थान के लिए तैयार हों।
प्रसंग-परिप्रेक्ष्य
यह अध्याय इस्राएल के आराधना-समारोहों के औपचारिक आरम्भ और लोक-निग्रहण की प्रक्रिया को दर्शाता है। चूँकि गिनती के सात दिनों के पश्चात यह दिन धार्मिक राज्य-योजनाओं के पूर्ण होने का प्रतीक है, मूसा का निर्देश बताता है कि परमेश्वर के सामने सेवा का सही क्रम कितनी महत्त्वपूर्ण है। हारून और पुत्रों को बुलाना, उनके लिए स्पष्ट भूमिका-निर्देश और पवित्र तर्क के साथ, यह दर्शाता है कि आम जनता के सामने भी आराधना के व्यवहार की शुद्धता अनिवार्य है।
व्याख्यात्मक बिंदु
संदर्भगत निष्कर्ष
1) यह घटना उस समय की है जब आकाश से आग नीचे आने की तैयारी होती है, और यह दिखाता है कि देव-आह्वान के पवित्र क्रम से ही आराधना स्वीकार्य बनती है।
2) पुरनियों को साथ बुलाना समुदाय के सभी भागों के साथ मिलकर आराधना-प्रक्रिया की मान्यता को सुनिश्चित करता है।
3) इस प्रसंग में नेताओं की व्यवस्था और कर्मचारियों के दायित्व साफ-साफ दिखते हैं: आदेश-पालन, पवित्रता बनाए रखना, और सार्वजनिक आराधना का आदर्श प्रस्तुत करना।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप में) और उनके अर्थ
• पलायन 19:6— पवित्रता और राष्ट्र-सेवा के उद्देश्य से विशिष्ट बने नियमों की महत्ता।
• इब्र 8:6— नए व्यवस्था में प्रार्थना और आराधना का उच्च मानक और प्रधान-याजकीय भूमिका।
• पहेलियों 4:5— निर्देशित पथ पर चलना और जिम्मेदारियाँ निभाना आराधना की सत्यता है।
संक्षिप्त उपयोगी takeaway
निष्कर्ष
इस verse से एक साधारण-सी, पर गहरी बात निकलती है: आराधना केवल आत्म-समर्पण नहीं, बल्कि एक सुविचारित, सामुदायिक क्रम है। मुंशी-नेतृत्व द्वारा निर्धारित पवित्र प्रक्रिया के अनुरंजन से ही उपासना का पूर्ण और स्वीकार्य स्वर बन सकता है।
नोट: नीचे उद्धृत शब्द-योग्यता में Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के सीधे छोटे उद्धरण उपलब्ध हों, केवल उन्हीं का उल्लेख किया गया है जो पाठ-परंपरा में सार्वजनिक-domain टिप्पणीकारों के थे।