Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
1 इतिहास 1 1 इतिहास 2 1 इतिहास 3 1 इतिहास 4 1 इतिहास 5 1 इतिहास 6 1 इतिहास 7 1 इतिहास 8 1 इतिहास 9 1 इतिहास 10 1 इतिहास 11 1 इतिहास 12 1 इतिहास 13 1 इतिहास 14 1 इतिहास 15 1 इतिहास 16 1 इतिहास 17 1 इतिहास 18 1 इतिहास 19 1 इतिहास 20 1 इतिहास 21 1 इतिहास 22 1 इतिहास 23 1 इतिहास 24 1 इतिहास 25 1 इतिहास 26 1 इतिहास 27 1 इतिहास 28 1 इतिहास 29



1 इतिहास 13:11 — संदर्भ में व्याख्या
इस पंक्ति में दाऊद ने अपनी योजना से एक महत्त्वपूर्ण भूल की जानकारी मिलती है। यहोवा की आज्ञाओं के विपरीत, दाऊद उजेह और इज़राइलियों के लिए एक ऐसा स्थान बनाना चाहते थे जो धरने का प्रतीक बन सके; परन्तु परमेश्वर नहीं चाहते थे कि वे बिना उचित पवित्रता के कोई ऐसी स्मारक बनाएं, जिससे उनका विश्वास सिर्फ शारीरिक आदि-आकर्षण बन जाए। परिणामस्वरूप यहोवा ने उज्जा पर टूट पड़ना भेजा और दाऊद को यह स्पष्ट हो गया कि परमेश्वर के साथ सही दिशा तभी मिलती है जब हम उसकी इच्छा को ऊपर रखें, न कि हमारी अपनी योजना के अनुसार। इस घटना से दाऊद ने अपने कदम पीछे किए और उस स्थान को पेरेसुज्जा कहा—जो यह स्पष्ट संकेत देता है कि परमेश्वर के विशिष्ट स्थान और उसकी महिमा के साथ खेलने की कोई ढिलाई नहीं होनी चाहिए।
मुख्य अर्थ
यह वाकया बताता है कि परमेश्वर के सामने हमारी योजनाओं को ढालना और उसकी इच्छा के अनुरूप चलना चाहिए, भले ही हमारी योजना कितनी भी अच्छी क्यों न हो। दाऊद का मूर्तिमान प्रयास यह दिखाता है कि परमेश्वर की पवित्र इच्छा के आगे मानव की प्रसन्नता या सफलता एक पल के लिए भी श्रेष्ठ नहीं होती। इस घटना के परिणाम स्वरूप वह स्थान “पेरेसुज्जा” बना, जो यह याद दिलाता है कि परमेश्वर को सम्मान देने हेतु हमें उनकी निषेध-सीमाओं का पालन करना चाहिए।
त्वरित मुख्य विषय
संबद्ध शास्त्रीगण की दृष्टि (संक्षेप)
Adam Clarke और Albert Barnes इस घटना को दाऊद की नम्रता–अभाव और परमेश्वर की पवित्रता के साथ संरेखण की कमी के रूप में देखते हैं, जो आगे जाकर उसे सचेत करते हैं कि स्मारकों के निर्माण में भी पवित्र मन और उचित पवित्रता होनी चाहिए। Henry के टिप्पणी में यह दर्शाया गया है कि ईश्वर के साथ व्यवहार करते समय हमें अपनी महत्ता नहीं, बल्कि उसकी महिमा को सर्वोच्च मानना चाहिए।
पवित्र वचन से दो-तीन क्रॉस-रेफरेंस
1 इतिहास 15:13 — यदि कोई संचालक परमेश्वर के आज्ञाकरण में ढील दिखाए, तो परमेश्वर उसे ठहराता नहीं है;6 2 इतिहास 26:16 — अय्यूब की मिसाल नहीं, बल्कि राजा का आत्म-मनन आवश्यक है;7 प्रचलित हिब्रानी उद्धरण (2 इतिहास 32:8) — प्रभु के संगतु, हम कमाल नहीं, बल्कि उसकी सहायता पर निर्भर हों।
व्यावहारिक विचार
हम अपने जीवन में भी कभी-कभी अपने लक्ष्य महान दिखाकर प्रभु के निर्देशों को किनारे कर सकते हैं। इस पाठ से सीखना चाहिए कि प्रार्थना, विचार, और समुदाय के साथ योजना बनाते समय पहले ईश्वर की इच्छा का आकलन करें और उसके मार्ग के अनुसार कदम उठाएं। ईश्वर के साथ सही क्रम में चलना, किसी भी योजना की सफलता से अधिक महत्त्वपूर्ण है।
संक्षिप्त समापन
1 इतिहास 13:11 हमें स्मरण कराता है कि परम पराक्रमी के सामने हमारी प्राथमिकता उसकी इच्छा होनी चाहिए, न कि हमारी महत्ता या सफलताएँ। दाऊद ने जल्दबाजी में एक योजना बनाई, परन्तु परमेश्वर के भय और पवित्रता के अनुसार पुनः झुकना सीख लिया। यह संदेश आज भी सत्य है: ईश्वर के साथ चलना तब ही संभव है जब हम उसकी पवित्रता को हमारे जियोरों के केंद्र में रखें।