2 इतिहास 32:25 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

परन्तु हिजकिय्याह ने उस उपकार का बदला न दिया, क्योंकि उसका मन फूल उठा था*। इस कारण उसका कोप उस पर और यहूदा और यरूशलेम पर भड़का।

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2 इतिहास 32:25 पद-दर-पद बाइबल टीका

सीधे अर्थ का सार

हाँक, ऐतिहासिक गुरुत्व का परिणाम यह है कि इज़किय़ाह ने ईश्वर के अनुग्रह के बदले में अपनाई गई दयालुता के प्रति कृतज्ञता नहीं दिखाई; उसका मन फूल उठा। इससे ईश कीर्ति पर अपमान और यहूदागण पर कोप लाया गया।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

2 इतिहास 32 अध्याय में असुर की सेना से यरूशलेम की रक्षा के समय राजा हिजकिय्याह के नेतृत्व का वर्णन है। ईश्वर ने उसकी प्रार्थना और सहायता से सफलता दी, पर उसी समय उसका अहंकार बढ़ गया और वह उपकार के लिए आभार नहीं दिखा पाया। यह चर्चा उस समय को दर्शाती है जब व्यक्ति सतह पर सफल दिखे भी तो आंतरिक नम्रता और परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता बनाए रखना चाहिए।

व्याख्यात्मक बिंदु

  • उपकार पर निर्भरता बनाये रखना: परमेश्वर द्वारा मिली रक्षा के बाद भी, मानवीय हृदय में कृतज्ञता का अभाव घटित हो सकता है।
  • मन का फूलना: आध्यात्मिक उन्नति की चुनौती यह है कि सफलता से आर्कषण बढ़े और humble नहीं रहा जाए।
  • प्रतिकार नहीं, बल्कि तौहीद: कोप का कारण यह है कि राजा ने उपकार का सही मूल्य नहीं समझा और परमेश्वर के साथ संबद्धता का महत्व भूल गया।

अनुचित व्यवहार के दुष्परिणाम

यह उपदेश देता है कि ईश्वर के कार्यों के प्रति कृतज्ञता के अभाव से व्यक्ति और राष्ट्र पर विपत्ति आ सकती है। आत्म-गौरव और भूल-चूक दोनों मिलकर प्रायः आशीषों को घटाते हैं और आशीर्वाद के स्रोत से दूरी बना देते हैं।

कुल मिलाकर निष्कर्ष

यद्यपि परमेश्वर ने जो किया, वह इसे बनाए रखने योग्य था, हिजकिय्याह का मन अगर ईश्वरीय उपकार के प्रति कृतज्ञ नहीं रहता, तो कोप और नष्टता के मार्ग खुलते हैं। यह कथा हमें यह सिखाती है कि निरन्तर विनम्र भाव और आभार से ही परमेश्वर की सुरक्षा और आशीष स्थिर रहते हैं।

संबद्ध दार्शनिक Cross-reference

यशायाह 33:6 — स्थिरता और न्याय की नींव का उल्लेख; आस्तित्वपूर्ण भय के बजाय विश्वास के साथ रक्षा पाएं।

नीतिगत सिद्धांत 16:18 — अभिमान से पतन की चेतावनी; विनम्रता ही जीवन का मार्ग है।

रोमियों 12:3 — प्रभु के प्रति सही मापदण्ड में आत्म-निर्णय और नम्रता की शिक्षा; महान लोगों की सफलता भी तौहीद की आवश्यकता को नहीं टालती।

संक्षिप्त व्यावहारिक निष्कर्ष

  • जीवन की हर सफलता में ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त करें।
  • आत्म-गौरव से बचते हुए नम्रता बनाये रखें।
  • कृतज्ञता और विनम्रता का अभ्यास परिवार और समुदाय में प्रेरणा बने।

यह विचार हमें बताता है कि उपकार के बदले में मानवीय हृदय की प्रतिक्रिया चाहे कैसी भी हो, सही संतुलन और ईश्वर के साथ निरंतर संबंध बनाए रखना वास्तविक धर्म है। (उद्धृत अंश: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन विचारों के संयोजन से सामान्य पाठ पर आधारित।)

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

2 इतिहास 32:25 समानांतर पद और संबंधित वचन

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परन्तु जब वह सामर्थी हो गया, तब उसका मन फूल उठा; और उसने बिगड़कर अपने परमेश्‍वर यहोवा का विश्वासघात किया, अर्थात् वह धूप की वेदी पर धूप जलाने को यहोवा के मन्दिर में घुस गया।

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2 इतिहास 24:18 (HINIRV) »
तब वे अपने पितरों के परमेश्‍वर यहोवा का भवन छोड़कर अशेरों और मूरतों की उपासना करने लगे। अतः उनके ऐसे दोषी होने के कारण परमेश्‍वर का क्रोध यहूदा और यरूशलेम पर भड़का।

2 इतिहास 32:31 HINIRV संबंधित बाइबल पद का चित्र
2 इतिहास 32:31 (HINIRV) »
तो भी जब बाबेल के हाकिमों ने उसके पास उसके देश में किए हुए अद्भुत कामों के विषय पूछने को दूत भेजे तब परमेश्‍वर ने उसको इसलिए छोड़ दिया, कि उसको परखकर उसके मन का सारा भेद जान ले।

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