Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
प्रेरितों के काम 1 प्रेरितों के काम 2 प्रेरितों के काम 3 प्रेरितों के काम 4 प्रेरितों के काम 5 प्रेरितों के काम 6 प्रेरितों के काम 7 प्रेरितों के काम 8 प्रेरितों के काम 9 प्रेरितों के काम 10 प्रेरितों के काम 11 प्रेरितों के काम 12 प्रेरितों के काम 13 प्रेरितों के काम 14 प्रेरितों के काम 15 प्रेरितों के काम 16 प्रेरितों के काम 17 प्रेरितों के काम 18 प्रेरितों के काम 19 प्रेरितों के काम 20 प्रेरितों के काम 21 प्रेरितों के काम 22 प्रेरितों के काम 23 प्रेरितों के काम 24 प्रेरितों के काम 25 प्रेरितों के काम 26 प्रेरितों के काम 27 प्रेरितों के काम 28Verse
प्रेरितों के काम 22:1 प्रेरितों के काम 22:2 प्रेरितों के काम 22:3 प्रेरितों के काम 22:4 प्रेरितों के काम 22:5 प्रेरितों के काम 22:6 प्रेरितों के काम 22:7 प्रेरितों के काम 22:8 प्रेरितों के काम 22:9 प्रेरितों के काम 22:10 प्रेरितों के काम 22:11 प्रेरितों के काम 22:12 प्रेरितों के काम 22:13 प्रेरितों के काम 22:14 प्रेरितों के काम 22:15 प्रेरितों के काम 22:16 प्रेरितों के काम 22:17 प्रेरितों के काम 22:18 प्रेरितों के काम 22:19 प्रेरितों के काम 22:20 प्रेरितों के काम 22:21 प्रेरितों के काम 22:22 प्रेरितों के काम 22:23 प्रेरितों के काम 22:24 प्रेरितों के काम 22:25 प्रेरितों के काम 22:26 प्रेरितों के काम 22:27 प्रेरितों के काम 22:28 प्रेरितों के काम 22:29 प्रेरितों के काम 22:30



मतलब का प्रत्यक्ष सार
प्रेरितों के काम 22:4 में पौलुस बताता है कि कैसे उसने पंथ के कारण पुरुषों-स्त्री को बाँधकर बन्दीगृह में डालकर आगे बढ़ने के प्रयास किये; यह विवरण उसकी पहली दाक्षिण्य-यात्रा की समय-सीमा में उसकी पूर्वाग्रहपूर्ण उत्साह को दर्शाता है और यह दर्शाता है कि उसने अपने विश्वास के इतिहास में कैसे कटु दबावों का सामना किया। यहाँ मुख्य विचार है—विश्वास के लिए उग्र दमन से प्रेरित होकर भी पौलुस के मन में धार्मिक बदलाव का परिणाम यह हुआ कि वह अंततः ईश्वरीय कृपा के संदेश को विश्वभर में पहुँचाने के लिए प्रेरित बना।
पृष्टभूमि और संदर्भ
यह वाक्य पवित्रशास्त्र के मुख्य कालखंड के भीतर आता है जब पौलुस—जो पहले एक दुष्ट पंथ-दमनकारी के रूप में जाना जाता था—पंथ के अनुयायों के विरुद्ध कठोर दमन में संलग्न था। उस समय धर्म-विभेद और नस्ल-भेद से परे, यह पल यह दिखाता है कि परमेश्वर की योजना में परिवर्तन कैसे होता है। संबद्ध संदर्भों में प्रेरितों के काम 9 और 26 अध्याय भी पौलुस के परिवर्तन के मार्ग को उद्घाटित करते हैं: एक बार वह क्रोध और दमन के साथ चलता है, परन्तु प्रभु की आवाज़ उसे पलट देती है।
व्याख्यात्मक बिंदु
संवादी उद्धरण (सार-उद्धरणित स्रोतों के अनुरूप)
अनुदीप्त टिप्पणियों के कारण, नीचे के भागों में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke से संगत विचारों को संक्षेप में जोड़ा गया है (स्थापित उद्धरणों के भीतर पूर्ण पंक्तियाँ उद्धृत नहीं की गईं हैं; केवल सारांश में उल्लेखित):
– Matthew Henry का संकेत है कि पौलुस का यह दमन-आचरण किसी प्रकार की धार्मिक असफलता नहीं, बल्कि उसकी पूर्ववर्ती विचारधारा की कठोरता का चित्रण है जिसे बाद में अनुग्रह से बदला गया।
– Albert Barnes यह मानते हैं कि साहस, निर्णय और कर्म-निष्ठा में भी मनुष्य पापकर्म कर सकता है; परन्तु परमेश्वर के पथ में परिवर्तन संभव है और यही पूर्णता की दिशा है।
– Adam Clarke यह दर्शाते हैं कि पाप में डूबे हुए भी प्रभु की कृपा उनके जीवन को नया मोड़ दे सकती है, और उनका संदेश अब अन्यमों तक पहुँचेगा—यही प्रेरणा।
नोट: ऊपर के तीनों धर्म-विचारक बिंदुओं के साथ उनके प्रमुख विचारों का संक्षिप्त सार प्रदान किया गया है। उनके दृश्यों के औपचारिक शब्दों का संपूर्ण उद्धरण यहाँ नहीं दिया गया है; यदि आप पंक्तिगत उद्धरण चाहते हैं, तो उनके प्रकाशित टिप्पणीयों के उद्धार को देखना उचित होगा।
क्रॉस-रेफरंस (संक्षिप्त व्याख्या के साथ)
1) प्रेरितों के काम 9:1-6 – पौलुस का अचानक परिवर्तन और प्रभु की आवाज़ का अनुभव; यह दिखाता है कि दमनकारी पथ भी दया से बदला जा सकता है।
2) प्रेरितों के काम 26:12-18 – जाँच-परख करके विश्वास के पथ पर चलना; प्रेरित का प्रत्यक्ष दुष्कर्म फिर भी ईश्वर के बुलावे को स्वीकारना।
3) प्रेरितों के काम 22:16 – “क्योंकि तू कबूल कर तारीफ कर” जैसे उद्धारक सम्वाद के साथ चढ़ना; इस पंक्ति में परिवर्तन की दिशा साफ होती है।
संक्षिप्त नैतिक निष्कर्ष
1) विश्वास कभी भी स्थिर नहीं रहता; अनुभवों के साथ उसे परिशुद्ध और मर्मस्पर्शी बनना चाहिए।
2) दमन के समय भी परमेश्वर की योजना में बदलाव संभव है; परिवर्तन सीधे ईश्वर की कृपा पर निर्भर है।
3) गिरावट से बचना कठिन है, पर उद्धारक के बचे रहने से नई दिशा मिलती है।