अय्यूब 30:20 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

मैं तेरी दुहाई देता हूँ, परन्तु तू नहीं सुनता; मैं खड़ा होता हूँ परन्तु तू मेरी ओर घूरने लगता है।

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अय्यूब 30:20 पद-दर-पद बाइबल टीका

अय्यूब 30:20 — तत्कालीन संदर्भ और दिर्गम

यह पद अय्यूब के दुखद समय का प्रत्यक्ष अनुभव व्यक्त करता है। वह अपने अपने दर्द के बीच सीधे परमेश्वर से प्रार्थना करता है, परन्तु उसकी सुनवाई नहीं हो पाती; वह खड़ा होता है, परन्तु उसी की ओर से जैसे चुप्पी और निर्वाण मिलती है। यह पाठ दो जीवित विचारों को वेध देता है: मानवीय आर्तनाद की असहायता और परमेश्वर की चुप्पी के बीच भी विश्वास बनाए रखने की आवश्यकता।

इस पाठ में परमेश्वर या विश्वास के बारे में क्या खुलता है

अय्यूब के इन शब्दों में यह पहचाना जा सकता है कि विश्वास का धागा कभी-कभी कट भी जाता है—जब वह प्रभु से अपनी चिर-आस्था के बावजूद भी गूंज सुन नहीं पाते, तो भी उसे अपने उद्धार का भरोसा नहीं छोड़ना चाहिए। यह एक ऐसी आत्म-चपलता है जिसमें विश्वासकर्ता अपनी आंतरिक यकीन को नहीं छोड़ता, यह जानकर भी कि परमेश्वर का अनुभव समय-समय पर अग्निपरीक्षा बन सकता है। इससे यह संकेत मिलता है कि परमेश्वर तात्कालिक सुनवाई का दायरा हर बार समान नहीं दिखाते, परन्तु उनका कानून और प्रेम स्थिर रहते हैं।

महत्वपूर्ण शब्दों या चित्रों की स्पष्टिकरण

  • दुहाई देना— एक गहन निर्णय-बोध है कि वस्तुतः व्यक्ति परमेश्वर के सामने अपने पंजे जमाकर अपनी पीड़ा व्यक्त करता है; यह कष्ट की पंक्ति है जो विश्वास के साथ जुड़ी है।
  • घूरना— यहाँ վերաբ यह दर्शाता है कि उत्तर न मिलना भी एक प्रकार की चेतावनी या गम्भीर चित्कर्ष हो सकती है; परमेश्वर की दृष्टि की गंभीरता और उद्देश्यों की दिशा में संकेतक है।

संबद्ध वचनों के निकट परिचय

यद्यपि अय्यूब की चिर आर्तना उत्तरहीन है, पर अन्य पवित्र शास्त्रों में भी यह विचार मिलता है कि कठिन समय में ईश्वर की चुप्पी भी एक प्रकार की परीक्षा है (उदा. स्तोत्र 22:1, 130:1)। साथ ही, विश्वास के परिश्रेण में धैर्य और धीरज प्रमुख गुण के रूप में उभरते हैं (रोमियों 8:25-28)।

व्यावहारिक अनुप्रयोग — आज के जीवन में

हम में से कितने ही समय में ईश्वर की आवाज साफ सुन नहीं पाते, तब भी हमारे लिए पांच बातें मार्गदर्शक बनती हैं: (1) अपनी पीड़ा को सच्चे दिल से प्रस्तुत करें; (2) समय के साथ निराशा न गहराने दें; (3) परमेश्वर के नये समय और नई कृपा की उम्मीद रखें; (4) विश्वस्त रहें कि दर्द के भीतर भी परमेश्वर का नियंत्रण है; (5) समुदाय और प्रार्थना का सहारा लें ताकि अकेलेपन का अनुभव कम हो।

कथननिष्ठ समावेशन — प्रसिद्ध टिप्पणीकारों के संकेत

Matthew Henry और Adam Clarke के टिप्पणियों से उधृत संकेत इस प्रकार हैं: “जब तक आत्मा प्रतिफल नहीं पाती, तब तक प्रार्थना करना चाहिए; चुप्पी कभी-कभी परमेश्वर के परीक्षण का भाग है।” Clarke के अनुसार, अय्यूब की अवस्था मेंGod’s sovereignty और human frailty का संघर्ष स्पष्ट है। (संकेत: Henry/Clarke से समान विचार)

छोटे cross-reference और उनके संक्षिप्त स्पष्टीकरण

  • स्तोत्र 22:1 — विश्वासी के संकट के समय ईश्वर की अनुपस्थिति की अनुभूति; यह पाठ अय्यूब के अनुभव से समान ध्वनि देता है कि क्यों कभी आवाज नहीं मिलती।
  • रोमियों 8:26-27 — आत्मा हमारी कमजोरियों के समय मदद करता है, कैसे भी हमारी Prarthana में ईश्वर की इच्छा शामिल रहती है।
  • जाक 1:12 — धैर्य के लिये प्रतिमा, परीक्षणों के समय स्थिर रहने की प्रेरणा देता है।

कुल मिलाकर, अय्यूब 30:20 हमारे लिये यह संदेश देता है कि ईश्वर की चुप्पी भी विश्वास की परीक्षा हो सकती है, और इस परीक्षा में भी हमारा विश्वास बनाए रखना उद्देश्यपूर्ण है, ताकि समय आने पर वह दयालु और साक्षार हो जाए जो हमारी देह, हमारी आत्मा और हमारे आस्थात्मक जीवन को नई दिशा दे।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

अय्यूब 30:20 समानांतर पद और संबंधित वचन

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