अय्यूब 31:1 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

“मैंने अपनी आँखों के विषय वाचा बाँधी है, फिर मैं किसी कुँवारी पर क्यों आँखें लगाऊँ?

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अय्यूब 31:1 पद-दर-पद बाइबल टीका

अय्यूब 31:1 परिचय और संदर्भ

पवित्र ग्रंथों के इस अंश में अय्यूब अपनी जीवन नैतिकता और चरित्र की एक-एक परख प्रस्तुत करते हैं। यह वचन उनके खुले और सत्यनिष्ठ चरित्र का प्रमाण है कि वे किसी भी प्रकार के अप्राकृतिक और अनैतिक दृष्टी से बचते हैं। इस आयत में वह अपनी आँखों की पाबंदी (आँखों के विषय वाचा) को एक दृढ़ प्रस्ताव के रूप में घोषित करते हैं, ताकि वे नैतिक पवित्रता में डिगे नहीं और उनके व्यवहार में पवित्रता के मानदंड बनी रहे।

क्या कहता है पाठ?

“मैंने अपनी आँखों के विषय वाचा बाँधी है, फिर मैं किसी कुँवारी पर क्यों आँखें लगाऊँ?”

यह एक ठोस प्रतिज्ञा है: दृष्टि की पवित्रता और इच्छाओं की मर्यादा बनाए रखना। अय्यूब कहता है कि वह अपने मन-आंखों को नियंत्रण में रखता है और किसी भी ऐसे रोमांचक या आपत्तिजनक दृश्य या विचार से सुरक्षित रहता है जो भीतरी पवित्रता को चोट पहुँचा सकता है।

भविष्य के विश्वास पर प्रकाश डालने वाले शब्द

यहाँ “आँखों के विषय वाचा” और “क्यों आँखें लगाऊँ” के भाव सूक्ष्म आचरण की कसौटी दिखाते हैं। यह सिर्फ नैतिक शुचिता नहीं है, बल्कि परमेश्वर के सामने अपनी आचरण-नियंत्रण की प्रतिबद्धता है।

पवित्र लेख से संबद्ध बातें

1) संतोष और पवित्रता की कसौटी: एक ही दायरे में रहने के लिए अय्यूब अपनी इच्छाओं पर नियन्त्रण रखता है—यही ईमानदारी का संकेत है।

2) आत्म-नियंत्रण का मूल्य: दैहिक संवेदनाओं पर नियन्त्रण रखना नैतिकता का मूल है, जिससे जीवन परमेश्वर के सामने सच्चा रहता है।

3) नैतिक समर्पण: यह प्रतिज्ञा बताती है कि आचार में एकजुटता और आयाम स्पष्ट हैं—किसी भी प्रकार की सीमाओं से ऊपर उठकर सत्य पर स्थिर रहना सही है।

प्रमुख प्रायः उद्धरण (Public-domain टिप्पणीकारों से संजोए गए अवलोकन)

मैथ्यू हेनरी की धारणा याद दिलाती है कि विश्वासयोग्यता में आत्म-नियंत्रण प्रमुख गुण है, क्योंकि मनुष्य अपनी दृष्टि से व्यवहार बनाता है। अ‍ॅडम क्लार्क भी इसी प्रकार दर्शाते हैं कि यथार्थ विवेक यह प्रेरणा देता है कि हम अपने शरीर को ईश्वर की पवित्रता के अनुरूप रखें।

उल्लेख—यहां का संक्षेप सार: आत्म-नियंत्रण और शोधपूर्ण नैतिकता व्यक्त होती है; शरीर और मन की पवित्र सीमा रखकर ईमानदारी का प्रकाश उभरता है।

अन्वेषण योग्य क्रॉस-रेफरेंसेस

  • प्रेरित संहिता में आत्म-नियंत्रण का महत्त्व: अन्यत्र भी मन-आत्मा के संयम की चर्चा मिलती है।
  • धर्मनिष्ठता बनाम संभावित वासनात्मक अनुराग: एक ही मार्ग पर स्थिर रहने की प्रेरणा।
  • वचनों की पवित्रता बनाम संसार की वासनाएँ: स्पष्ट रूप से आचरण की पवित्र सीमा।

इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि अय्यूब का वक्तव्य एक नैतिक निर्धारण है—आंखों के विषय को नियंत्रित रखना और परमेश्वर के सामने ईमानदार व्यवहार बनाये रखना।

आज के लिए अनुप्रयोग

  • कंट्रोल पथ: दैनिक जीवन में दृश्य-आकर्षणों के प्रति सचेत रहें। अनैतिक दृश्यों या वेबसाइटों, मीडिया से दूरी बनाकर आत्म-नियंत्रण को मजबूत करें।
  • संयम की प्रैक्टिस: छोटे-छोटे निर्णयों से आत्म-नियंत्रण विकसित करें—खर्च, समय-प्रबंधन, और भाषा की मर्यादा में भी सख्ती बरतें।
  • प्रतिज्ञा की याद: प्रत्येक दिन एक संकल्प याद दिलाने वाला हो—“मैं अपनी आँखों की पवित्रता बनाए रखूँगा।”

प्रसंगगत रूप से यह आयत हमें बताती है कि विश्वास की राह में स्व-नियंत्रण एक मजबूत आधार है, जिससे जीवन परमेश्वर के अनुरूप बन सकता है और निष्ठा की गहराई में प्रवेश संभव होता है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

अय्यूब 31:1 समानांतर पद और संबंधित वचन

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परन्तु प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही अभिलाषा में खिंचकर, और फँसकर परीक्षा में पड़ता है।

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क्योंकि जो कुछ संसार में है, अर्थात् शरीर की अभिलाषा, और आँखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्ड, वह पिता की ओर से नहीं, परन्तु संसार ही की ओर से है। (रोम. 13:14, नीति. 27:20)

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परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ, कि जो कोई किसी स्त्री पर कुदृष्टि डाले वह अपने मन में उससे व्यभिचार कर चुका।

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