मत्ती 5:28 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ, कि जो कोई किसी स्त्री पर कुदृष्टि डाले वह अपने मन में उससे व्यभिचार कर चुका।

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मत्ती 5:28 पद-दर-पद बाइबल टीका

भाष्य का संक्षिप्त अर्थ

इस पद में यीशु स्पष्ट करते हैं कि पाप केवल बाहरी कार्यों तक सीमित नहीं है; मन की अभिलाषा भी उसे जन्म देती है। जो कोई किसी स्त्री पर कुदृष्टि डाले, वह अपने मन में व्यभिचार कर चुका है। यह वास्तविक नैतिक कसौटी है: विचार और इच्छा भी परमेश्वर के सामने प्रचारित अपराध बन जाते हैं।

संदर्भीय पृष्ठभूमि

यह पाठ मत्ती के सुवचन-संहिता के सर्वश्रेष्ठ ज्ञान-उच्चारित भाग का हिस्सा है, जहाँ यीशु पहाड़ पर आशीर्वचन देता है (सदा-स्पष्ट नैतिक ऊँचाई की ओर संकेत)। यहाँ वह प्रेम-नियम को केवल बाह्य नियमों तक सीमित न रहने की बातें समझाते हैं; मनुष्य के हृदय की अवस्था को भी judged करते हैं।

व्याख्यात्मक observations

  • कुदृष्टि का स्वरूप: दृश्यमान इमानदारी के अलावा, दृष्टि या कल्पना भी आचरण की दिशा तय करती है।
  • मन और व्यवहार के बीच संबंध: भीतर की इच्छा यदि गलत हो, तो बाहरी क्रिया से पहले ही पाप पक्का हो चुका होता है।
  • आत्मिक जवाबदेही: ईश्वर हृदय के विचारों तक देख रहा है और उसे बदलने की आवश्यकता है।

छोटे थेमाचिक बिंदु

  1. आचरण की पवित्रता; विचारों पर नियंत्रण का महत्त्व
  2. नैतिक जवाबदेही का दायरा: केवल कर्म नहीं, मन की अवस्था भी वही परिणाम देती है

संलग्न क्रॉस-रेफरेंसेज (सार संक्षेप)

• स्त्री-पुरुष संबंधों में पवित्रता के सिद्धांत के बारे में प्रेरित शिक्षाएं Այह; यशायाह के समान भावनात्मक शुद्धता भी संकेत देती हैं। (उद्धरण नहीं दिया गया पूर्ण पद नहीं दिया गया)

• येशु के आदर्शों में विचारों की दायित्वपूर्णता का उल्लेख अन्य सुसमाचारों में भी मिलता है; जैसे कि मन के इरादे का मूल्य बढ़ना। (संकेत-आधार: मत्ती 5 के आगे के पैरा और लूका 6 के कुछ हिस्से)

• पुराने नियम में भी “मन का विचार” और “दिल की इच्छा” के बीच प्रतिभायें मिलती हैं, जिससे यह विषय परमेश्वर के समक्ष नैतिक दायित्व का केंद्र बनता है।

व्यावहारिक निष्कर्ष

1) न केवल पवित्र कार्य करें, बल्कि स्मरण रखें कि सोच के स्तर पर भी पवित्रता बनाए रखना चाहिए। 2) आत्म-नियम: ईमानदार प्रार्थना और पवित्र-जीवन के अभ्यास से मन की कुदृष्टि पर नियंत्रण। 3) वैयक्तिक प्रतिबिंब: यदि किसी विचार के कारण आत्मग्लानि हो, तो तुरंत भरोसे के साथ परमेश्वर के पास विनती करें और जिम्मेदारी के साथ मार्गदर्शन लें।

कन्डेन्स्ड समरी

यह उपदेश बताता है कि पाप की परिभाषा बाहर के कर्मों तक सीमित नहीं है; मन की अवस्था भी पाप के समान है। यीशु की शिक्षाओं के अनुसार पवित्रता विचारों से शुरू होकर आचरण तक जाती है, और ईश्वर से चिपकने पर ही हृदय को शुद्ध किया जा सकता है।

नोट: नीचे के उद्धरण में Matthew Henry, Albert Barnes आदि के विशिष्ट शब्द उपलब्ध नहीं थे, परंतु उनके प्रकाशन-छवियों से लिया गया सामान्य विचार इस पाठ के अनुरूप है—जो मन और लक्ष्य की पवित्रता पर बल देता है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

मत्ती 5:28 समानांतर पद और संबंधित वचन

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