मत्ती 5:33 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

“फिर तुम सुन चुके हो, कि पूर्वकाल के लोगों से कहा गया था, ‘झूठी शपथ न खाना, परन्तु परमेश्‍वर के लिये अपनी शपथ को पूरी करना।’ (व्य. 23:21)

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मत्ती 5:33 पद-दर-पद बाइबल टीका

मत्ती 5:33 का संदर्भ और उसके अर्थ

यह वचन मसीह के महासंवाद—परिचयिक सार—में शपथ के बारे में पूर्वकहावट की समीक्षा को आगे बढ़ाता है। मत्ती गोपनीय कानून-व्यवस्था के भीतर लोगों की सांसारिक व्यवहार-शैली को वर्तमान समय के लिए प्रस्तुत करता है। “पहले कहा गया था” के रूप में वह पुराने नियम के नियमों के आधार पर स्पष्ट करता है कि शपथ की बात सिर्फ नियम के अनुसार नहीं, बल्कि आंतरिक सत्य और ईमानदारी के साथ होनी चाहिए।

मुख्य अर्थ

ईश्वरीय नियम के अनुसार शपथ किसी ऐसी बात की पुष्टि बननी चाहिए जिसे निष्कर्ष तक सच माना जा सके। यीशु कह रहे हैं कि शपथ की आवश्यकता केवल बाहरी शब्दों के कटाक्ष में नहीं हैं, बल्कि दिल की नीयत और आचरण में है। परमेश्वर के सामने गवाही देने का उद्देश्य सत्य को संरक्षित करना है, न कि सहज प्रयोग के लिए शब्दों की शक्ति का प्रदर्शन।

2–3 प्रमुख थीम

  1. आंतरिक सत्य बनाम बाहरी शपथ: सतही शपथ से अधिक महत्त्वपूर्ण है कि हमारा व्यवहार और शब्द सत्यापित हों।
  2. ईमानदारी की स्थिरता: ऐसी शपथें भी चाहिए जो जीवन भर के अनुरोधों और निष्ठा से बनती हों, न कि क्षणिक परिस्थिति के अनुसार बदली जाएं।
  3. ईश्वर के नाम की महिमा: परमेश्वर के लिए अपनी शपथ पूरी करना मानवीय रिश्तों मेंविश्वास और स्थिरता बनाता है।

संदर्भित शब्द और साहित्यिक स्वीकृत विचार

पवित्रशास्त्र के अन्वय में यह परंपरागत सिद्धांत आता है कि शपथ का उद्देश्य सत्य की पुष्टि है, न कि शपथ को एक औचित्य बना देना। पुराने अध्ययनकारों के अनुसार यह नियम मानवीय प्रतिबद्धता को उच्चतम स्तर तक उठाने के लिए है।

क्रॉस-रेफरेंसेस

1) औचित्य के आधार पर सत्यता: निर्बाध सत्य के लिए शब्दों की आवश्यकता कम-से-कम होनी चाहिए, ताकि विश्वास में किसी प्रकार की भ्रमण-ता न रहे।

2) सत्य और नेक मार्ग: यह वचन अन्य शिक्षाओं के साथ जुड़कर यह बताता है कि वचनबद्धता का आचरण न केवल शब्दों से, बल्कि जीवन के व्यवहार से प्रकट होना चाहिए।

3) शपथ का दायित्व: परमेश्वर के सामने हर वचन की सच्चाई एक विश्वसनीय रिश्ते की नींव है।

व्यावहारिक विचार

व्यावहारिक जीवन में इसका संदेश यह है कि आप अपने प्रत्येक शब्द के साथ ईमानदार और दृढ़ रहें—चाहे परिस्थिति कैसी भी हो। यदि आप सच बोलकर, विवेकपूर्ण शपथ लेकर, तो लोग आपकी विश्वसनीयता पर विश्वास करेंगे और संबंध मजबूत होंगे।

संक्षेप

फरमान देता है कि दूसरों से पूर्व काल की शपथ-नीति के स्थान पर अब भी सत्य और पारदर्शिता को प्राथमिकता दें। परमेश्वर के सामने जीवन की सत्यनिष्ठा ही शपथ की वास्तविक शक्ति है, न कि शाब्दिक औपचारिकता।

नोट: नीचे दिए गए दो–तीन क्रॉस-रेफरेंस विचारधारा से प्रेरित हैं; यह केवल संदर्भ हेतु हैं, पूर्ण पाठ नहीं दिए गए हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

मत्ती 5:33 समानांतर पद और संबंधित वचन

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“जब तू अपने परमेश्‍वर यहोवा के लिये मन्नत माने, तो उसे पूरी करने में विलम्ब न करना; क्योंकि तेरा परमेश्‍वर यहोवा उसे निश्चय तुझ से ले लेगा, और विलम्ब करने से तू पापी ठहरेगा। (मत्ती 5:33)

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लैव्यव्यवस्था 19:12 (HINIRV) »
तुम मेरे नाम की झूठी शपथ खाके अपने परमेश्‍वर का नाम अपवित्र न ठहराना; मैं यहोवा हूँ। (मत्ती 5:33)

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सभोपदेशक 5:4 (HINIRV) »
जब तू परमेश्‍वर के लिये मन्नत माने, तब उसके पूरा करने में विलम्ब न करना; क्योंकि वह मूर्खों से प्रसन्‍न नहीं होता। जो मन्नत तूने मानी हो उसे पूरी करना।

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