Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मत्ती 15:1 मत्ती 15:2 मत्ती 15:3 मत्ती 15:4 मत्ती 15:5 मत्ती 15:6 मत्ती 15:7 मत्ती 15:8 मत्ती 15:9 मत्ती 15:10 मत्ती 15:11 मत्ती 15:12 मत्ती 15:13 मत्ती 15:14 मत्ती 15:15 मत्ती 15:16 मत्ती 15:17 मत्ती 15:18 मत्ती 15:19 मत्ती 15:20 मत्ती 15:21 मत्ती 15:22 मत्ती 15:23 मत्ती 15:24 मत्ती 15:25 मत्ती 15:26 मत्ती 15:27 मत्ती 15:28 मत्ती 15:29 मत्ती 15:30 मत्ती 15:31 मत्ती 15:32 मत्ती 15:33 मत्ती 15:34 मत्ती 15:35 मत्ती 15:36 मत्ती 15:37 मत्ती 15:38 मत्ती 15:39



ईसाई पाठ: मत्ती 15:1 — प्रारम्भिक संदर्भ और संदिग्ध संकेत
तब यरूशलेम से कुछ फरीसी और शास्त्री यीशु के पास आकर कहने लगे,
यह छोटा-सा उद्घोष पाठ के ठोस आरम्भ में यह दर्शाता है कि यीशु की शिक्षाओं के विरुद्ध पवित्र-अनुष्ठान और परंपरा-नियमों के बारे में तीखी बहस उभरती है। यह दृश्य पाठक को बताता है कि धार्मिक नेतृत्व कैसे प्रश्न कर रहे थे और किन मानदंडों के भीतर वे चेष्टा कर रहे थे।
पठित पाठ से दिखती बातें और परमेश्वर/विश्वास का संकेत
यहाँ परमेश्वर के राज्य के प्रति मानवता के दृष्टिकोण के साथ-साथ आचरण की धारणा स्पष्ट होती है। फरीसी और शास्त्री का आगमन एक बारहवीं-युग के धार्मिक अनुशासन-प्रवाह का प्रतिनिधित्व करता है, जो यह पूछते हैं कि सुधार कौन-सी परंपराओं में बैठा है। यीशु का उत्तर इनका लक्ष्य धार्मिकता के बहाने मानवीय तृप्ति और मानक-प्रदर्शन से ऊपर जाकर आन्तरिक पवित्रता पर जोर डालना है।
महत्त्वपूर्ण शब्दों की स्पष्टता
सम्बद्ध पाठ
संकुल संबंधी पढ़ाव में निम्न संदिग्ध संकेत मिलते हैं:
हीरो-रुचि और आधुनिक अनुप्रयोग
आज के पाठक के लिए यह पाठ सीख देता है कि धार्मिक रीति-रिवाज भले ही महत्त्वपूर्ण हों, पर वास्तविक धार्मिकता आत्मा और मन की पवित्रता से बनती है। हमारे समय में भी साहचर्य, दया और मन के परिवर्तन को प्राथमिकता देनी चाहिए।
क्रॉस-रेफरेंस के नज़रिए से संबल
1) इब्रानियों 10:1-2 जैसे संकेत बताते हैं कि कानून के बारे में बाह्य क्रियाएं शुद्ध नहीं बनातीं; आंतरिक आस्था और समर्पण आवश्यक हैं।
2) याकूब 2:14-17— भौतिक विश्वास यदि कर्मों के बिना है, तो वह व्यर्थ है; क्रियाओं के साथ आस्था की पुष्टि होती है।
3) मत्ती 23:25-28— यीशु परंपरा के भीतर भी आंतरिक पाप की निंदा करते हैं, जब बाहर की पवित्रता भीतर से मेल नहीं खाती।
संक्षिप्त समापन
यह उद्धरण एक ऐसी परीक्षा है जिसमें धार्मिक गतिविधियों के पीछे की भावना और परिवर्तनशीलता को परखा गया। विशेष रूप से हिंदी पाठक के लिए यह याद दिलाता है कि परमेश्वर की इच्छा है: भीतरी पवित्रता, दया और सत्य से भरी आस्था।
यहोवा के साथ हमारे दैनिक मार्गदर्शन
आज के प्रभाव के साथ:
युक्ति-टिप्पणियाँ: यह विचलन हमें यह संकेत देता है कि परमेश्वर के सामने आंतरिक परिवर्तन से अधिक कुछ भी टिकाऊ नहीं।