Old Testament
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मत्ती 15:1 मत्ती 15:2 मत्ती 15:3 मत्ती 15:4 मत्ती 15:5 मत्ती 15:6 मत्ती 15:7 मत्ती 15:8 मत्ती 15:9 मत्ती 15:10 मत्ती 15:11 मत्ती 15:12 मत्ती 15:13 मत्ती 15:14 मत्ती 15:15 मत्ती 15:16 मत्ती 15:17 मत्ती 15:18 मत्ती 15:19 मत्ती 15:20 मत्ती 15:21 मत्ती 15:22 मत्ती 15:23 मत्ती 15:24 मत्ती 15:25 मत्ती 15:26 मत्ती 15:27 मत्ती 15:28 मत्ती 15:29 मत्ती 15:30 मत्ती 15:31 मत्ती 15:32 मत्ती 15:33 मत्ती 15:34 मत्ती 15:35 मत्ती 15:36 मत्ती 15:37 मत्ती 15:38 मत्ती 15:39



संक्षिप्त परिचय
मत्ती 15:19 में यीशु भीतर से उठने वाले हृदय के दुष्ट प्रवृत्तियों की सूची देते हैं। यह वचन यह स्पष्ट करने की कोशिश करता है कि बाहरी नियम या रस्में जब तक हृदय शुद्ध न हो, तब तक आचरण की जड़ में परिवर्तन नहीं आता। हिनाइआरवी अनुवाद का पाया गया पद इस विचार को संक्षेप में रखता है: बुरे विचार और उन से उपजने वाले अन्य अपराध मन से निकलते हैं।
अध्याय के सन्दर्भ में यह पद
यह वचन फरीसियों और धार्मिक नेताओं द्वारा परम्परागत रीति—रिवाजों पर जोर देने के बीच आया है। यीशु पहले यह बतलाते हैं कि बाहरी अनुशासन पर्याप्त नहीं है यदि अंदर से शुद्धता नहीं है। मत्ती 15 का सन्दर्भ बताता है कि धार्मिक आचार-व्यवहार का केंद्र हृदय होना चाहिए न कि केवल बाह्य नियम।
मुख्य आध्यात्मिक शिक्षा
इस पद की मुख्य शिक्षा यह है कि पाप की जड़ें मन में हैं। आत्मा की नीयत, विचार और इच्छाएँ व्यवहार के स्रोत हैं। इसलिए वास्तविक धर्म आत्म-निरीक्षण और हृदय की शुद्धता पर केन्द्रित होना चाहिए। बाहरी नियमों का महत्व है, पर वे हृदय में परिवर्तन का विकल्प नहीं बन सकते।
प्रासंगिक बाइबिल संबंध
व्याख्या और विचार
सूची किए गए अपराध—बुरे विचार, हत्या, परस्त्रीगमन, व्यभिचार, चोरी, झूठी गवाही और निन्दा—एक-दूसरे से जुड़े मनोवैज्ञानिक और नैतिक पहलुओं को दर्शाते हैं। यीशु यह नहीं कह रहे कि बाहरी कृत्यों का कोई महत्व नहीं; बल्कि वे यह स्पष्ट कर रहे हैं कि उन कृत्यों का स्रोत मन का स्वभाव है। जब मन बदलता है तब कर्म बदलते हैं।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
उसी तरह जैसे वृक्ष अपने फल से जाना जाता है, हमें अपने विचारों और प्रेरणाओं पर ईमानदार रहना चाहिए। यह कुछ कदम उपयोगी होंगे:
महान टिप्पणीकारों के कुछ संक्षिप्त उद्धरण
मैथ्यू हेनरी ने सरलता से कहा है कि "हृदय पर हमला किए बिना हाथ और जीभ सुधारना व्यर्थ है।" (संक्षेप उद्धरण)
ऑल्बर्ट बार्न्स ने उल्लेख किया कि यीशु का उद्देश्य मन की जड़ें उजागर करना है ताकि वास्तविक सुधार हो सके। (संक्षेप उद्धरण)
एडम क्लार्क ने लिखा कि सूचीबद्ध पाप हृदय के भीतर के विभिन्न प्रकट रूप हैं जिन्हें बाहर बदलने का प्रयत्न तब तक अधूरा रहेगा जब तक भीतर परिवर्तन न आए। (संक्षेप उद्धरण)
समाप्ति—सारांश
मत्ती 15:19 हमें याद दिलाता है कि सच्ची धार्मिकता हृदय के सुधार से शुरू होती है। बाहरी नियम महत्त्वपूर्ण हैं पर वे हृदय परिवर्तन का स्थान नहीं ले सकते। इसलिए आध्यात्मिक जीवन में पहला कदम अपने विचारों और इच्छाओं को जाने बिना नहीं लिया जा सकता। इस पद का चुनौतीपूर्ण परन्तु आज का संदेश स्पष्ट है: अंदर से शुद्धता उत्पन्न करें, तभी स्वच्छ आचरण फलित होगा।