Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मत्ती 26:1 मत्ती 26:2 मत्ती 26:3 मत्ती 26:4 मत्ती 26:5 मत्ती 26:6 मत्ती 26:7 मत्ती 26:8 मत्ती 26:9 मत्ती 26:10 मत्ती 26:11 मत्ती 26:12 मत्ती 26:13 मत्ती 26:14 मत्ती 26:15 मत्ती 26:16 मत्ती 26:17 मत्ती 26:18 मत्ती 26:19 मत्ती 26:20 मत्ती 26:21 मत्ती 26:22 मत्ती 26:23 मत्ती 26:24 मत्ती 26:25 मत्ती 26:26 मत्ती 26:27 मत्ती 26:28 मत्ती 26:29 मत्ती 26:30 मत्ती 26:31 मत्ती 26:32 मत्ती 26:33 मत्ती 26:34 मत्ती 26:35 मत्ती 26:36 मत्ती 26:37 मत्ती 26:38 मत्ती 26:39 मत्ती 26:40 मत्ती 26:41 मत्ती 26:42 मत्ती 26:43 मत्ती 26:44 मत्ती 26:45 मत्ती 26:46 मत्ती 26:47 मत्ती 26:48 मत्ती 26:49 मत्ती 26:50 मत्ती 26:51 मत्ती 26:52 मत्ती 26:53 मत्ती 26:54 मत्ती 26:55 मत्ती 26:56 मत्ती 26:57 मत्ती 26:58 मत्ती 26:59 मत्ती 26:60 मत्ती 26:61 मत्ती 26:62 मत्ती 26:63 मत्ती 26:64 मत्ती 26:65 मत्ती 26:66 मत्ती 26:67 मत्ती 26:68 मत्ती 26:69 मत्ती 26:70 मत्ती 26:71 मत्ती 26:72 मत्ती 26:73 मत्ती 26:74 मत्ती 26:75


मति 26:1 का स्पष्ट अर्थ
यह पद बताता है कि यीशु अपनी शिक्षा के समापन से पहले यह बतला रहे हैं कि अब घटनाओं का क्रम शुरू होने को है। “जब यीशु ये सब बातें कह चुका” का आशय है—उक्त शिक्षाओं, चितवनों और चेतावनियों के आखिरी चरण के बाद अब उसकी गिरफ्तारी और क्रूस के मार्ग की वास्तविकता सामने आने वाली है। इस वाक्य से पाठक को यह स्मरण होता है कि परमेश्वर की योजना में न्याय और कृपा दोनों एक साथ चलते हैं: यीशु अपने मिशन की कठिनाईयों को स्वीकार कर रहे हैं ताकि हम उद्धार पा सकें।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यहेक समय यीशु ने अपने शिष्यों को यह सूचित किया कि वह देख कर चल रहा है कि क्या वह दीन, विश्वास और समर्पण का उच्चतम उदाहरण बनेंगे। महायज्ञ-तैयारी और विश्वासी जीवन के लिए शिक्षाओं के बाद अब वह क्रूस तक का मार्ग समझा रहे हैं। यह पद मसीही सुरक्षा की दिशा में एक निर्णायक मोड़ का संकेत देता है, जब यीशु अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान के लोकोत्तर उद्देश्य की तरफ जाते हैं।
व्याख्यात्मक अवलोकन
- यीशु ने जो कुछ कहा है, वह चेलों को भविष्य की घटना के लिए सचेत करता है ताकि वे दावा कर सकें कि वे उसे छोड़कर नहीं भागेंगे, और साथ ही वह उन्हें तीखे प्रश्नों के लिए प्रशिक्षित कर रहा है।
- यह वक्तव्य चेलों के लिए एक शिक्षा है कि सदा प्रभु पर भरोसा और उसके उद्देश्य के अनुरूप आचरण बनाए रखें, भले ही परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों।
थीमैटिक बिंदु
केंद्रीय क्रॉस-रेफरेंसेज़ (संक्षेप में)
- मरकस 14:1-2 और लूका 22:1-2: यद्यपि अलग विवरण हैं, दोनों जगह यीशु की गिरफ्तारी से पहले की घटनाओं की तैयारी पर बल है।
- यूहन्ना 13:1-17: गुरु-चेलों की सेवा और निमंत्रण का उदाहरण देता है कि कैसे यीशु नम्रता और त्याग की मिसाल बनते हैं।
संक्षेपित निष्कर्ष और व्यावहारिक takeaway
यह संदेश हमें याद दिलाता है कि प्रभु के चरणों के साथ चलना वही है जो ईमानदार श्रद्धा को घूंघट नहीं उठा पाने देता। हमें कठिनाईयों में भी विश्वास बनाए रखना और उनके आह्वान के अनुसार जीवन बिताना चाहिए।
पठन-योग्य संदर्भ
1) से प्रेरित पूर्व प्रेम और त्याग की शिक्षा: यूहन्ना 13:1-17 के सिद्धांत।
2) विश्वास-समर्थन के उदाहरण: मरकस 14:1-2; लूका 22:1-2।
3) क्रूस की तैयारी के बीच सेवा और निष्ठा: मत्ती 20:28 के संदर्भ में यीशु का सेवक-स्वरूप।
छोटा उद्धरण (यदि आवश्यक हो): Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के संक्षिप्त विचारों के भीतर सीधे उद्धरण केवल वहीं बताए गए हैं जहां उपलब्ध हों।