मत्ती 26:24 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

मनुष्य का पुत्र तो जैसा उसके विषय में लिखा है, जाता ही है; परन्तु उस मनुष्य के लिये शोक है जिसके द्वारा मनुष्य का पुत्र पकड़वाया जाता है: यदि उस मनुष्य का जन्म न होता, तो उसके लिये भला होता।”

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मत्ती 26:24 पद-दर-पद बाइबल टीका

मति 26:24 का अर्थ (HINIRV): मनुष्य का पुत्र को किया जाना संकेत, और उसकी तैयारी तथा परिणाम

इस पद के सीधे अर्थ में कहा गया है: मनुष्य का पुत्र जैसा कि यह उसके विषय में लिखा गया है, वैसा ही चलता है; परन्तु जो उस मनुष्य के लिए अवसर बनाता है, उसके लिये शोक है। यदि उस पुरुष का जन्म न होता, तो उसे भला होता।

संदर्भ-भूमिका

यह ईशावली की घड़ी है: यीशु के पूर्व-घटना और उसके भीतर के आत्मिकी संकट की चोटी तक पहुंचना। यहाँ “मनुष्य का पुत्र” अपने आप से नहीं, बल्कि उद्धार के लिए उसकी गिरफ्तारी और भविष्यवाणी की दिशा में संकेत देता है। यहूदी मान्यता में, मसीह के बारे में यह भविष्यवाणी और उसकी पीड़ा से जुड़ी अनुभूति है; यीशु कहते हैं कि उनकी गिरफ्तारी एक निर्धारित योजना का भाग है, पर वह दुःख-दुःख में है कि इस योजना के कारण एक व्यक्ति को हानि होगी।

टिप्पणी-नोट्स (संक्रमण-आधारित विवेचना)

- Matthew Henry के अनुसार यह उपदेश है कि यीशु की मृत्यु एक ऐसी कीमत है जो उद्धार के लिए चुकानी पड़ी, और जो लोग इससे विचलित हुए, वे एक अत्यंत विपदा की ओर बढ़ेंगे।

- Albert Barnes के अनुसार यहाँ एक गम्भीर विवेक-चेतना है: यदि लोगों ने इसे न समझा, तो उनका जन्म ही व्यर्थ होगा, क्योंकि जीवन का उद्देश्य परमेश्वर के शासन को मानना और संपूर्ण बंधन को निभाना है।

- Adam Clarke के साथ एक संयुक्त दृष्टिकोण यह है कि “यदि उस मनुष्य का जन्म न होता” से संकेत यहूदी-परंपरा में मृत्यु से पहले की शांति नहीं, बल्कि जन्म-भूमि को छोड़ने का विचार है—यानी वह जो शांति और भलाई से जीना चाह रहा था, अब उसे उद्धार के क्रम में तकलीफ उठानी पड़ती है।

मुख्य विचार

  • नियति बनाम स्वतंत्रता: यीशु की कुर्बानी एक निर्धारित योजना का भाग है, परन्तु दुःख उसी के द्वारा आता है जो उसका कारण बनता है।
  • उद्धार के मूल्य: मृत्यु के मार्ग से उद्धार संभव होता है, किन्तु इसके परिणाम में एक व्यक्ति के लिए दु:ख और शोक भी है।
  • जीवन का उद्देश्य: जन्म और जीवन का वास्तविक उद्देश्य परमेश्वर के उद्देश्य को समझना और उसमें भागीदारी करना है।

क्रॉस-रेफरेंस (संक्षिप्त तुलना)

1) मत्ती 20:18-19 – यीशु अपने आप को पहले से बताए गए मार्ग पर ले जाते हैं; यह गिरफ्तारी और मृत्यु की तैयारी दिखाता है। यह verses यह संकेत देते हैं कि दुख एक नियत क्रम का हिस्सा है, जिससे उद्धार निकलता है।

2) मसीह-भविष्यण की शिक्षा (यशायाह 53): सर्वस्वरूप में प्रताड़ना और क्रूरता की योजना होते हुए भी मसीह का योगात्मक प्रभाव उद्धार की दिशा बनाता है।

3) यूहन्ना 3:16 – परमेश्वर के प्रेम के कारण ही उद्धार संभव है, भले ही इसके लिए व्यक्ति को शोक सहना पड़े; यह verse इस पाठ के संदेश को आत्मिक ऊर्ध्वगामी बनाता है।

व्यावहारिक निष्कर्ष

- दृढ़ विश्वास रखें: कठिनाई के बीच भी ईश्वर की योजना पर भरोसा रखें, क्योंकि उद्धार का मूल्य कभी-कभी पीड़ा से होकर ही प्राप्त होता है।

- दूसरों के साथ करुणा: जो लोग उद्धार की राह में असहाय हों, उनके लिए सहानुभूति और प्रार्थना आवश्यक है, ताकि दर्द के साथ भी आशा बनी रहे।

संक्षिप्त समरी

इस वाक्य में यीशु अपने भविष्य में होने वाले दर्द और गिरफ्तारी की घटना के प्रति गहरी संवेदना और निष्ठा दिखाते हैं। यह बात स्पष्ट करती है कि उद्धार की योजना में पीड़ा एक तथ्य है, परन्तु उसका उद्देश्य मानवता के लिये भलाई और जीवन का पुनःस्थापन है।

नोट: इस टिप्पणी में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के तात्कालिक सार विचारों को सम्मिलित किया गया है; यदि आप उनके शब्द सीधे उद्धृत सुनना चाहें, तो नीचे-स्तर के छोटे उद्धरण मिलेंगे:

“The Son of man goeth as it is written of him” (Henry, Barnes, Clarke के विचारों के समेक्षण के अनुसार)

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

मत्ती 26:24 समानांतर पद और संबंधित वचन

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और उनसे कहा, “यह लिखा है कि मसीह दुःख उठाएगा, और तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठेगा, (यशा. 53:5, लूका 24:7)

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परन्तु परमेश्‍वर की सहायता से मैं आज तक बना हूँ और छोटे बड़े सभी के सामने गवाही देता हूँ, और उन बातों को छोड़ कुछ नहीं कहता, जो भविष्यद्वक्ताओं और मूसा ने भी कहा कि होनेवाली हैं,

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परन्तु पवित्रशास्त्र की वे बातें कि ऐसा ही होना अवश्य है, कैसे पूरी होंगी?”

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