Old Testament
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मत्ती 26:1 मत्ती 26:2 मत्ती 26:3 मत्ती 26:4 मत्ती 26:5 मत्ती 26:6 मत्ती 26:7 मत्ती 26:8 मत्ती 26:9 मत्ती 26:10 मत्ती 26:11 मत्ती 26:12 मत्ती 26:13 मत्ती 26:14 मत्ती 26:15 मत्ती 26:16 मत्ती 26:17 मत्ती 26:18 मत्ती 26:19 मत्ती 26:20 मत्ती 26:21 मत्ती 26:22 मत्ती 26:23 मत्ती 26:24 मत्ती 26:25 मत्ती 26:26 मत्ती 26:27 मत्ती 26:28 मत्ती 26:29 मत्ती 26:30 मत्ती 26:31 मत्ती 26:32 मत्ती 26:33 मत्ती 26:34 मत्ती 26:35 मत्ती 26:36 मत्ती 26:37 मत्ती 26:38 मत्ती 26:39 मत्ती 26:40 मत्ती 26:41 मत्ती 26:42 मत्ती 26:43 मत्ती 26:44 मत्ती 26:45 मत्ती 26:46 मत्ती 26:47 मत्ती 26:48 मत्ती 26:49 मत्ती 26:50 मत्ती 26:51 मत्ती 26:52 मत्ती 26:53 मत्ती 26:54 मत्ती 26:55 मत्ती 26:56 मत्ती 26:57 मत्ती 26:58 मत्ती 26:59 मत्ती 26:60 मत्ती 26:61 मत्ती 26:62 मत्ती 26:63 मत्ती 26:64 मत्ती 26:65 मत्ती 26:66 मत्ती 26:67 मत्ती 26:68 मत्ती 26:69 मत्ती 26:70 मत्ती 26:71 मत्ती 26:72 मत्ती 26:73 मत्ती 26:74 मत्ती 26:75



मुख्य interpretive बिंदु
मत्ती 26:9 में कहा गया अवसर यह दर्शाता है कि उसने गहनों का व्यापार या महँगी वस्तुएँ नहीं, बल्कि दान के अवसर के लिए धन के सार को समझने की बात कही है। यद्यपि विषय रीति-रिवाज में आता है, स्मरण रहे कि यह कथन ठहराव नहीं, बल्कि एक आलोचना है कि कुछ लोग बहुतायत धन को लोगों की भलाई के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लाभ के लिए एक अवसर के रूप में देखते हैं। यीशु के निर्माण-कार्य और उसके शिष्य-समुदाय के बीच यह टिप्पणी मानवीय विवेक की परीक्षा है: क्या धन को मानव सेवा के लिए उधार दिया जाए या उसे अर्पण-भाव से खर्च किया जाए?
ग्रंथ-संदर्भ के साथ साहित्यिक संदर्भ
यह वाक्य एक प्रसंग का हिस्सा है जहाँ कुछ लोग गहनों के सवाल पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। यह पंक्ति उन दलीलों की סוגरावट है जो धन के मूल्य और उसके प्रयोग के नैतिक आयामों को चुनौती देती है। इसके पीछे एक प्रमुख विचार है: सही समय और सही उद्देश्य के लिए धन का उपयोग, न कि मात्र पारंपरिक औचित्य के पालन के लिए।
गुत्थियों और थियोलॉजिक संकेत
- धन का प्रयोग किस प्रकार से दैवीय हितों के लिए किया जाए? कुछ अवसरों पर धन का सबसे पवित्र उद्देश्य गरीबों के लिए, संस्थाओं के लिए या प्रेम के प्रदर्शन के लिए होता है।
- यह कथन शिष्यों के विश्वास-चेटना को भी उजागर करता है कि वे संसारिक संपत्ति की प्राथमिकता और ईश्वर के राज्य के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं।
पवित्रशास्त्र के क्रॉस-रेफरेंसे
1) पवित्रशास्त्र में धन के उपयोग के नैतिक प्रश्न बार-बार उठते हैं; प्रभु यीशु के वचन धन की सही दिशा की ओर इशारा करते हैं।
2) गरीबों को सहायता देना स्थाई आशीष के मार्ग दर्शाता है, और यह सत्यान्वेषी चरित्र की अभिव्यक्ति है।
3) धन का दान और नैतिक विवेक के साथ संयोजन प्रभु के राज्य के भविष्यदर्शी उद्देश्यों को संरचना देते हैं।
reflection के लिए कुछ प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
यह पंक्ति धन के उपयोग की नैतिक परख प्रस्तुत करती है: दान-वृत्ति और मानवीय सहभागिता के साथ धन का सही प्रयोग ईश्वर के राज्य के उन्नयन का एक अभिन्न हिस्सा है। शिष्यत्व में यह चेतावनी है कि धन के मूल्यांकन में मानवीय अंश और निष्काम प्रेम का संयोजन हो।
पर्स्नल cross-reference नोट
मत्ती 26:9 का विचार धन के दान और समाज-सेवा से जुड़ा है; प्रेरित पौलुस के लेखन में भी इसी दिशा की चर्चा मिलती है कि धन और दान—इन दोनों के साथ प्रेम का विवेक जरूरी है। ये संदर्भ व्यक्तिगत आचरण में सद्गुणों के दर्पण बनते हैं।
उद्धरण संदर्भ (Public-domain commentary)
यदि आप पुराने सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों की सुसंगत बातों को देखते हैं, तो ईश्वरीय विवेक और धन के सही उपयोग के संबंध में उनके विचार मिलते हैं।