Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
यूहन्ना 12:1 यूहन्ना 12:2 यूहन्ना 12:3 यूहन्ना 12:4 यूहन्ना 12:5 यूहन्ना 12:6 यूहन्ना 12:7 यूहन्ना 12:8 यूहन्ना 12:9 यूहन्ना 12:10 यूहन्ना 12:11 यूहन्ना 12:12 यूहन्ना 12:13 यूहन्ना 12:14 यूहन्ना 12:15 यूहन्ना 12:16 यूहन्ना 12:17 यूहन्ना 12:18 यूहन्ना 12:19 यूहन्ना 12:20 यूहन्ना 12:21 यूहन्ना 12:22 यूहन्ना 12:23 यूहन्ना 12:24 यूहन्ना 12:25 यूहन्ना 12:26 यूहन्ना 12:27 यूहन्ना 12:28 यूहन्ना 12:29 यूहन्ना 12:30 यूहन्ना 12:31 यूहन्ना 12:32 यूहन्ना 12:33 यूहन्ना 12:34 यूहन्ना 12:35 यूहन्ना 12:36 यूहन्ना 12:37 यूहन्ना 12:38 यूहन्ना 12:39 यूहन्ना 12:40 यूहन्ना 12:41 यूहन्ना 12:42 यूहन्ना 12:43 यूहन्ना 12:44 यूहन्ना 12:45 यूहन्ना 12:46 यूहन्ना 12:47 यूहन्ना 12:48 यूहन्ना 12:49 यूहन्ना 12:50



यूहन्ना 12:5 पर टिप्पणी: “यह इत्र तीन सौ दीनार में बेचकर गरीबों को क्यों न दिया गया?”
यह पद प्रबल नैतिक-आलोचना के संदर्भ में है। यूहन्ना के Gospel में कहीं-कहीं ऐसा दृश्य मिलता है जहाँ मरियम ने येशु के लिए एक बहुमूल्य इत्र (बुद्धिपूर्ण आस्था और सम्मान के प्रतीक के रूप में) का प्रदर्शन किया। इस अवसर पर शास्त्रवchi टिप्पणीकार खासकर दो धाराओं की ओर इशारा करते हैं: एक तरफ भावनात्मक प्रेम और समर्पण, दूसरी तरफ योजनाबद्ध सामाजिक-नैतिक दायित्व। इस कथा का प्रमुख सवाल यह उठता है कि क्या मूल्यवान सामग्री को प्रभु के प्रति सम्मान के लिए लगाया जाना चाहिए या उसे गरीबों में बांटा जाना चाहिए? इसे संतुलित तरीके से देखना चाहिए ताकि न तो स्वार्थ की आलोचना हो और न ही सेवा के लिए आवश्यक विवेक का नुकसान हो।
मुख्य अर्थ
मरियम ने प्रभु के लिए महँगे इत्र की महिमा व्यक्त की; यह प्रेम और उपासना का प्रतीक है। यीशु ने इसे स्वीकार किया और संकेत दिया कि वह आत्मिक वास्तविकता पर विचार कर रहे हैं—कि उनका उद्धार और निधन निकट है, और यह एक प्रकार की प्रतीकात्मक तैयारी है। कुछ व्याख्याओं के अनुसार, धन का सबसे उपयुक्त उपयोग भी प्रभु के साथ जुड़ा हुआ है, क्योंकि वह जीवन का केंद्र है। अन्य व्याख्याओं में यह दिखता है कि गरीबों के प्रति सम्मान और सहायता का कर्तव्य भी उसकी शिक्षाओं में निरंतर है; अतः संदेह नहीं कि यीशु की सेवा और करुणा दोनों एक साथ चलना चाहिए।
दो-तीन प्रमुख विषय
संदर्भित पंक्तियाँ से सम्बन्ध
यूहन्ना 12 के पूरे संदर्भ में यह घटना यीशु के लोकप्रिय स्वागत के पूर्व एक स्पष्ट संकेत है कि उनका यहाँ आना और उनका मिशन एक विपरीत ध्वनि उत्पन्न कर रहा है—एक ओर प्रेमपूर्ण भक्तिभाव, दूसरी ओर लोगों की आधिकारिक प्रतिक्रियाएँ। अन्य उद्धरण जो इस विचार को पुष्ट करते हैं: प्रभु पर निर्भरता और सेवक का आशीर्वाद, तथा गरीबों की चिंता से जुड़ा नैतिक दायित्व।
व्यावहारिक विचार
हम कैसे निर्णय लें कि कब दया और भक्ति के उच्च अभ्यासों को समाज के आवश्यकताओं के साथ संतुलित किया जाए? एक मार्ग यह है कि प्रेम के कार्यों के साथ विवेक की सदा-सत्कार्यता भी बनी रहे: जो कार्य परमेश्वर के निकटतम उद्देश्य को पूरा करें, वे दोनों तरफ से प्रेरित हों—उद्धार की घड़ी में विशेष प्रेम और सामान्य भलाई की प्रथा का संरक्षण।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यह Verse प्रेम की उच्चतम अभिव्यक्ति का उदाहरण देता है—परमेश्वर के दिए गए अनुग्रह के प्रति समर्पण। साथ ही यह याद दिलाता है कि समाज के जरूरतमंदों के लिए सम्मान और सहायता का दायित्व भी बराबर है। संगत शिक्षाओं के आलोक में यह स्पष्ट होता है कि जीवन में मूल्यवान वस्तुयों के उपयोग के लिए विवेक, परिस्थिति और उद्धार के उद्देश्य को ध्यान में रखना चाहिए।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप)
- मत्ती के अनुसार प्रभु की पूजा में मधुरता और भक्ति का महत्व स्पष्ट है; यह प्रेम के प्रदर्शन का एक रूप है।
- मरकुस-लूका में भी प्रभु के सम्मान के लिए कुछ विशेष क्रियाओं का उल्लेख है, जो सामाजिक दायित्वों के साथ संतुलन पर विचार कराते हैं।
- प्रेरितों के कार्यों में गरीबों की सहायता के संकेत बारम्बार मिलते हैं, जो समुदाय की आपस में मदद की परंपरा को मजबूत करते हैं।
परिचयात्मक उद्धरण: माता-हेनरी, अलेक्टर बार्न्स और एडम क्लार्क के शब्दों से संकलित संकेत इस पाठ के व्यवहारिक-आध्यात्मिक आयाम को उजागर करते हैं: प्रेम, विवेक और गरीबों के प्रति दायित्व का संयोजन।