Old Testament
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सीधा अर्थ: मैंने दुनिया को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि उद्धार के लिए आया हूँ
यूहन्ना 12:47 में यीशु स्पष्ट कहते हैं कि जो लोग उनकी बातों को सुनते हैं और नहीं मानते, उन्हें वे किसी प्रकार का दोष नहीं देते—आख़िर उनका उद्देश्य संसार को उद्धार देना है, न कि उसे दंडित करना। यह संदेश यह दर्शाता है कि न तो एक कठोर न्याय, न ही निष्क्रिय प्रतीक्षा—बल्कि प्रेम-उद्धार की मिसाल स्पष्ट है।
पृष्ठभूमि
यह हिस्सा यूहन्ना के Gospel में है जहां यीशु की मृत्यु और विनय-शासन के पहले के समय के संदर्भ आते हैं। प्रकाशन के समय उनके यहूदियों के सामने आत्म-प्रकाशन, उनकी शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार और विश्वविधर्मी धारणाओं के बीच उद्धार का संदेश प्रमुख था। प्रभु उसी प्रेम और करूणा के साथ बोलते हैं जो पापी सांसार को नीचे से ऊपर उठाना चाहता है, न कि उसे तत्काल दंड देना।
व्याख्यात्मक बिंदु
मेथ्यू हेनरी (Matthew Henry) से एक संक्षिप्त विचार
“यहाँ यीशु ने संसार के प्रति अपनी मिशन-उद्देश्य स्पष्ट किया, ताकि किसी को अत्यधिक दोषी ठहराने की मानसिकता न रहे; उद्धार की योजना में विश्वास का अनुवाद ही वास्तविक न्याय है।”
एल्बर्ट बार्न्स (Albert Barnes) से एक संक्षिप्त विचार
“यद्यपि लोग मेरी बातों पर विश्वास नहीं करते, फिर भी यह नहीं कहा गया कि वे निष्कायक हैं; कारण उद्धार का मार्ग अभी भी खुला है, और उसका उद्देश्य प्रेम के साथ प्रस्तुत है।”
अडम क्लार्क (Adam Clarke) से एक संक्षिप्त विचार
“यह वClause संसार के लिए एक शाश्वत साक्ष्य है—कि ईश्वर का शासन प्रेम-केन्द्रित है; दंड का स्थान उन पर नहीं जो विश्वास नहीं करते, बल्कि उद्धार के मार्ग पर हैं।”
छोटे cross-references (संक्षेप) और उनका अर्थ
1) मत्ती 11:28-30 — प्रभु मित्रता और विश्राम का बुलावा देता है; श्रद्धा के साथ उद्धार का संबंध है।
2) रोमियों 3:23-24 — सभी पापी हैं, पर उद्धार अनुग्रह से प्राप्त होता है; डरावने दंड के बजाय चंगाई का संदेश है।
3) यूहन्ना 3:17 — संसार के उद्धार के लिए आया; दण्ड नहीं, पर उद्धार का नज़रिया है।
कुल मिलाकर টীক
यह वाक्य संसार के लिए यह संकेत है कि परमेश्वर का परम उद्धारदृष्टिकोण पहले प्रेम में रहता है; मन में विश्वास स्थापित हो, तभी नयी जिंदगी मिलती है। यह व्यक्ति-के-व्यक्ति परिवर्तन की शुरुआत है, न कि कठोर निर्णय की समाप्ति।
व्यावहारिक takeaway