Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मरकुस 7:1 मरकुस 7:2 मरकुस 7:3 मरकुस 7:4 मरकुस 7:5 मरकुस 7:6 मरकुस 7:7 मरकुस 7:8 मरकुस 7:9 मरकुस 7:10 मरकुस 7:11 मरकुस 7:12 मरकुस 7:13 मरकुस 7:14 मरकुस 7:15 मरकुस 7:16 मरकुस 7:17 मरकुस 7:18 मरकुस 7:19 मरकुस 7:20 मरकुस 7:21 मरकुस 7:22 मरकुस 7:23 मरकुस 7:24 मरकुस 7:25 मरकुस 7:26 मरकुस 7:27 मरकुस 7:28 मरकुस 7:29 मरकुस 7:30 मरकुस 7:31 मरकुस 7:32 मरकुस 7:33 मरकुस 7:34 मरकुस 7:35 मरकुस 7:36 मरकुस 7:37



मरकुस 7:21 स्व-उत्पन्न बुराइयों का स्रोत भीतर से है
सीधा अर्थ: मनुष्य के भीतर के मन से उठकर बुरे विचार और आत्मा–कपट की हरकतें जन्म लेती हैं; बाहर से नहीं, बल्कि जो विचार मन में आते हैं वही परिणाम बनकर व्यवहार में प्रकट होते हैं।
पार्श्व-प्रसंग और संदर्भ
यूहन्नी-परंपरा के विपरीत, यीशु यहाँ धर्म-व्यवस्था के बाहरी रीतियों पर नहीं, बल्कि मन की अवस्था और मन के इरादों पर केंद्रित हैं। पुराने नियम में भी स्पष्ट है कि परमेश्वर सतह के रीति-रिवाज से नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता से प्रसन्न होता है। मरकुस 7:21–23 में यीशु ने यह दर्शाया कि नैतिक दूषितता मूलतः मानव की अंतरतम प्रवृत्ति से उत्पन्न होती है, न कि केवल बाहरी कर्मों से।
व्याख्या एवं महत्वपूर्ण बिंदु
• भीतर से निकलने वाले बुरे विचार पहले दिल में जन्म लेते हैं; फिर वे व्यभिचार, चोरी, हत्या आदि के रूप में outward कर्म बनते हैं। यह संकेत करता है कि परिवर्तन मन के परिवर्तन से शुरू होता है।
• यह शिक्षण मानव स्वभाव की गहराई पर प्रश्न उठाता है कि नैतिक जीवन सिर्फ आचरण बदलने से नहीं, बल्कि विचारों और इरादों की सफाई से संभव है।
• दूसरों के ऊपर कठोर व्यवहार के बजाय, उद्धारकर्ता की दया और पवित्रता के अनुरूप मन और विचारों की त लोनी चाहिए ताकि कर्म और निर्णय पवित्र हों।
छोटी थीम-सूची
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप में स्पष्टता के साथ)
• मत 15:19–20: मन्द्रण से पाप का उद्भव और उसकी प्रकृति के बारे में व्यवस्थित विवेचना बताई गई है।
• जेम्स 1:14–15: विचारों के ठहराव से पाप के जन्म की क्रमिक प्रक्रिया का उल्लेख, जिसे कर्म में परिणत होने से पहले रोकना चाहिए।
• याकूब 1:14–15: मन के आकर्षण से पाप कैसे उमड़ता है और उसमें कैसे वृद्धि होती है; अंततः मृत्यु का परिणाम दर्शाता है।
निर्देशित पाठ्यों के लिए संक्षिप्त व्यावहारिक निष्कर्ष
विशेष टिप्पणी – पूर्वसूत्रों से संकलन
इस पाठ के लिए ऐतिहासिक शिक्षाओं में मॅथ्यू हेनरी, आर्बन बॉर्न्स और एडम क्लार्क के नोट्स एक साथ पढ़ने पर विवेक मिलता है कि भीतर से उभरना ही वास्तविक पवित्रता का मापदंड है।
मैथ्यू हेनरी का संकल्प: "मन के विचारों ही से कर्म बनते हैं; इसलिए पवित्रता मन से आरम्भ होती है"—यह उनकी सामान्य व्याख्या के अनुरूप है (संक्षेपित सार)।
एलबर्ट बर्न्स का निष्कर्ष: बाहरी धार्मिकता से अधिक आवश्यक है दिल की पवित्रता, जो विचारों में परिवर्तित हो कर कर्मों तक पहुँचती है।
एडम क्लार्क का अवलोकन: मन के भीतर की बुराइयाँ ही समाजी व्यवहार का मूल कारण बनती हैं; इसलिए ईमानदारी से अंतरतम परिवर्तन को प्राथमिकता दें।
संरचना-नोट
यह पाठ हृदय की शुद्धता की मांग करता है—बुरे विचारों को भीतर से पहचानना और ईश्वरीय सहायता से उन्हें सुधारना।