Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मरकुस 15:1 मरकुस 15:2 मरकुस 15:3 मरकुस 15:4 मरकुस 15:5 मरकुस 15:6 मरकुस 15:7 मरकुस 15:8 मरकुस 15:9 मरकुस 15:10 मरकुस 15:11 मरकुस 15:12 मरकुस 15:13 मरकुस 15:14 मरकुस 15:15 मरकुस 15:16 मरकुस 15:17 मरकुस 15:18 मरकुस 15:19 मरकुस 15:20 मरकुस 15:21 मरकुस 15:22 मरकुस 15:23 मरकुस 15:24 मरकुस 15:25 मरकुस 15:26 मरकुस 15:27 मरकुस 15:28 मरकुस 15:29 मरकुस 15:30 मरकुस 15:31 मरकुस 15:32 मरकुस 15:33 मरकुस 15:34 मरकुस 15:35 मरकुस 15:36 मरकुस 15:37 मरकुस 15:38 मरकुस 15:39 मरकुस 15:40 मरकुस 15:41 मरकुस 15:42 मरकुस 15:43 मरकुस 15:44 मरकुस 15:45 मरकुस 15:46 मरकुस 15:47



मतलब का सीधा सार
मरकुस 15:1 में कहा गया है कि भोर होते ही राजा-याजकों, वरिष्ठों और शास्त्रियों की सभा ने यीशु को गिरफ्तार कर बंधवाया और उसे पिलातुस के हवाले कर दिया। इसका तात्पर्य है कि उसकी गिरफ्तारी की रात भर चली साजिश और दोष-योजना के बाद पहली रोशनी के साथ वह सरकार के समीप प्रस्तुत किया गया ताकि राजााधिकारियों के निर्णय को व्यावहिक रूप से लागू किया जा सके।
पृष्ठभूमि का संदर्भ
यहार (यूहन्ना) के मिलनसार घटनाक्रम में, यीशु को रात भर पूछताछ के दौरों से गुजरना पड़ा और फिर राजकीय जाँच के लिए पीलातुस के समक्ष भेजा गया। यहाँ “भोर” का उल्लेख ऐसे समय को दर्शाता है जब कानून और नागरिक व्यवस्था के अनुसार अदालत की प्रक्रियाएँ शुरू होतीं, और धार्मिक नेतृत्व की साजिश ने उसे मृत्यु-दंड के रास्ते पर धकेलना चाहा।
व्याख्यात्मक अवलोकन
स्वीकृत उद्धरणों से नयी दृष्टि
हेन्री (Matthew Henry) और क्लार्क (Adam Clarke) के अनुरूपीय टिप्पणियाँ इस बात की पुष्टि करती हैं कि धार्मिक नेताओं की साजिश ने वास्तविक न्याय के अवसर को दबाने की कोशिश की, और यीशु के द्वारा सहनशीलता का एक उच्च उदाहरण प्रस्तुत किया गया।
संलग्न शीर्षकबद्ध बिंदु
अन्य संबंधित शास्त्र-पथ
1) मत्ती 26:57-68 — यीशु की गिरफ्तारी और राज-दंड की प्रक्रियाओं का संगीत. यह दिखाता है कि कैसे धर्म-नेतृत्व ने न्याय के स्थान पर आरोप-प्रायोजन चुना।
2) लूका 22:66-71 — संकल्प और पहचाने जाने की बहस; यह बताता है कि न्याय के मानदंड कैसे राजनीतिक दबावों से प्रभावित होते हैं।
3) यूहन्ना 18:28-40 — पिलातुस के सामना और निर्णय-संक्रमण; यह दर्शाता है कि सत्ता के सामने सत्य कैसे टिकता है।
व्यावहारिक निष्कर्ष
यिसू के प्रति झुकाव और सच्चे धर्म की खोज में, हमें न्याय में दया और सत्य को संतुलित रखना सिखाया गया है। प्रेरक प्रश्न: क्या हम भी कभी दबाव में सत्य से पीछे चलते हैं या विपरीत परिस्थितियों में भी अपने विश्वास पर अडिग रहते हैं?
संदर्भ में मौलिक विचारार्थ: Matthew Henry के सामान्य टिप्पणी, Albert Barnes तथा Adam Clarke के दृष्टिकोणों से समन्वित विश्लेषण। यदि उद्धरण सीधे संकलनों में हो, तो वे यहाँ संक्षेप में उद्धृत होंगे।