Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
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मतलब का सीधा संकेत
मरकुस 15:18 में कहा गया यह वाक्य यह दर्शाता है कि यीशु के अपराध-रहित शासन की प्रतीक्षा कर रहे यहूदियों के सिर पर सम्मानजनक परिकार मांगना या “राजाओं” की जय-जयकार करना उचित नहीं था; उन्होंने उसे नमस्कार किया, पर यह नमस्कार राजनीतिक-यश को प्रकट करने के लिए था, न कि ईश्वर की सेवा के अनुरूप आस्था से। यह पंक्ति तीखी व्यंग्य के रूप में प्रस्तुत करती है कि लोग क्रूस पर चढ़े मुक्तिदाता के प्रति भी मान-सम्मान को दुनिया की मान्यता के अनुरूप देखने लगे।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
सूचित होता है कि यह घटना पिलातुस के सामने यीशु के क्रूस तक ले जाने के समय की है, जब लोग उसे यहूदी राजा कहकर क्रूसीकरण की प्रतीक्षा कर रहे थे। मार्क जो gospel में अक्सर क्रूस की प्रक्रिया और उसका भाव स्पष्ट करते हैं, उसमें यह वाक्य यह दिखाता है कि लोग उद्धारकर्ता की पहचान को राजनीति के आह्वान के साथ जोड़ते हैं।
व्याख्यात्मक अवलोकन
छोटे thematic बिंदु
अन्य पदों से संबंध
यह घटक दृश्य अन्य गॉस्पेल्स में भी क्रूस के समय लोगों के यहूदी-राज-निर्वचन की प्रतिक्रिया से जुड़ता है (उदा., अन्य प्रेषितियों के क्रूस घटनाक्रमों में भी “राजा का स्वागत” के पदों से संदर्भ मिलते हैं) — इनसे सम्बन्ध यह है कि उद्धारकर्ता की पहचान लोग अपने सामाजिक-राजनीतिक मानक के अनुसार करना चाहते हैं, जबकि सच्चे विश्वास की दिशा उसकी सेवा और बलिदान में है।
व्यावहारिक takeaway
यह पाठ हमें यह सिखाता है कि सच्चे केंद्र में यीशु की पहचान कैसे होनी चाहिए: मान-प्रतिष्ठा के बजाय आस्था और सेवाभाव पर। जीवन के कठिन घड़ों में भी हमें प्रभु के उद्देश्य के अनुरूप जवाब देना चाहिए, यह साबित करते हुए कि यीशु का राजय विनम्रता और बलिदान से जुड़ा है, न कि भक्तों के मंचीय नमस्कार से।
क्रॉस-रेफरेंस
1) एक अन्य गॉस्पेल में भी क्रूस के समय लोग उद्धारकर्ता के साथ ऐसी प्रतिक्रियाएँ दिखाते हैं; यहां संदर्भ यह है कि उद्धारकर्ता की पहचान सामाजिक मानदंडों के साथ नहीं मिलती।
2) कृपा के राज को सामर्थ्यपूर्ण राज्य के रूप में देखने के बजाय, स्वयं को सेवा में विकसित करने का सन्देश मिलता है।
3) यीशु के नमस्कारों के पीछे तात्पर्य यह कि हमें भी अपने सम्मान-नीतियों से ऊपर सत्य-विश्वास और प्रेम-प्रेरित सेवा चुननी चाहिए।
ऐतिहासिक टिप्पणी (पूर्व-प्रथम स्रोतों के संकेत)
इस पथ में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke जैसे प्राचीन पवित्र-व्याख्याकारों की संस्तुतियों से मिलती-जुलती पंक्तियाँ मिलती हैं जो यह बताते हैं कि यह नमस्कार बाह्य प्रतीक है और वास्तविक आस्था केouten के अनुरूप नहीं है। एहि विवेचनाओं के अनुसार उद्धारकर्ता को मान-सम्मान के रूप में नहीं, बल्कि क्रूस-मार्ग की स्वीकृति के रूप में देखना चाहिए।
नोट: आवश्यक क्षुद्र शब्द-उद्धरण इन प्रविष्टियों में छोटे संदर्भ के रूप में समाहित हैं; पूर्ण पैगंबर-ग्रंथ से उद्धरण नहीं दिया गया है।