Old Testament
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मत्ती 5:1 मत्ती 5:2 मत्ती 5:3 मत्ती 5:4 मत्ती 5:5 मत्ती 5:6 मत्ती 5:7 मत्ती 5:8 मत्ती 5:9 मत्ती 5:10 मत्ती 5:11 मत्ती 5:12 मत्ती 5:13 मत्ती 5:14 मत्ती 5:15 मत्ती 5:16 मत्ती 5:17 मत्ती 5:18 मत्ती 5:19 मत्ती 5:20 मत्ती 5:21 मत्ती 5:22 मत्ती 5:23 मत्ती 5:24 मत्ती 5:25 मत्ती 5:26 मत्ती 5:27 मत्ती 5:28 मत्ती 5:29 मत्ती 5:30 मत्ती 5:31 मत्ती 5:32 मत्ती 5:33 मत्ती 5:34 मत्ती 5:35 मत्ती 5:36 मत्ती 5:37 मत्ती 5:38 मत्ती 5:39 मत्ती 5:40 मत्ती 5:41 मत्ती 5:42 मत्ती 5:43 मत्ती 5:44 मत्ती 5:45 मत्ती 5:46 मत्ती 5:47 मत्ती 5:48



मत्ती 5:23‑24 का स्पष्टार्थ—भेंट एवं भाईविरोध
यह पद यूहन्ना के आशीर्वचन नहीं, बल्कि प्रभु यीशु के हिस्से में दी गई Sermon on the Mount के भीतर एक व्यवहारिक निर्देश है। वे कह रहे हैं कि यदि तुम वेदी के पास अपनी भेंट चढ़ाने आते हो और स्मरण कर लेते हो कि तुम्हारे भाई के मन में तुम्हारे बारे में कुछ विरोध है, तो पहले उसे ठीक कर लो फिर आकर अपनी भेंट पेश करो (चयनित अनुवाद में भाव यह है: ऐसा हो कि विवाद न रह जाए)। धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक संबंधों में शांति बनाये रखना यीशु के अनुसार परमेश्वर के राज्यों में अनिवार्य है।
मुख्य अर्थ
प्रभु यह दिखाते हैं कि ईश्वर के सम्मुख आराधना पूरी होती है जब मानवीय सम्बन्ध साफ़ हों। भेंट-बलि से पहले रिश्तों की सुध लेने की बात बताकर वे पूजा-अर्चना के सत्यपूर्ण सार को जीवन के रोजमर्रा के स्तर पर स्थापित करना चाहते हैं। यह बतौर आस्था का क्रिया-प्रणालीन है कि हम अपनी गलतीयों को मानकर सुधार करें, वरना हमारी भेंट व्यर्थ हो सकती है।
के प्रमुख विषय
पवित्र संदर्भ और क्रॉस-रेफरेंसेस
1) मत्ती 6:14‑15 — क्षमा के बिना हमारी Prarthna और उपहार का प्रभाव घटता है; यह दर्शाता है कि मन:स्थिति सत्यापित होनी चाहिए।
2) मर्क 11:25 — भूल-चूक के पश्चात भी प्रार्थना के समय क्षमा माँगना और दूसरों को क्षमा करना आध्यात्मिक जीवंतता के लिए आवश्यक है।
3) यूहन्4:20‑21 — ईश्वर से प्रेम के साथ साथ अपने भाई-बहन से प्रेम वह सच्चे धर्म का भाग है; विभाजन से पूजा की वास्तविकता टूटती है।
उचित सार और व्यावहारिक चिंतन
यह वाचन हमें याद दिलाता है कि धर्मग्रंथों में ‘कृपा और शांति’ का दायरा सिर्फ उपासना तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत संबंधों की मरम्मत में भी निहित है। यदि आप किसी से असहमति या चोट के कारण दूरी बनाए हुए हैं, तो उसे संबोधित करना पहले आवश्यक है, ताकि ईश्वर के सामने प्रस्तुत होने वाला प्रेम-भेंट सचमुच सराहना पाए। यह दैवीय-नीति है कि हम दूसरे के हृदय के दर्द को समझें और उसे ठीक करने का प्रयास करें।
संक्षिप्त निष्कर्ष
भेंट भले ही पवित्र हो, पर यदि उसका सार असहमतियों को गहरा कर दे, तो उसे पहले सुलझाकर, फिर श्रद्धा-पूजा करनी चाहिए। यह प्रभु के आदर्श का प्रमाण है: प्रेम, क्षमा और सत्य का समन्वय जीवन के हर क्षेत्र में लागू हो।
इन विचारों के साथ, आप अपने रिश्तों की दिशा का आत्म-आकलन करें और ईश्वर की दिशा में कदम बढ़ाएं।
नोट: यदि कोई पाठक Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के संकलनों से एकरस उद्धरण चाहते हैं, तो नीचे उनके शब्दों की स्वाभाविक सम / संदर्भित रेखाएं द्रष्टव्य हैं—पर इन्हें पूर्ण उद्धरण के रूप में नहीं लिया गया है; पाठ में केवल विचारात्मक प्रेरणा के रूप में प्रयोग किया गया है:
“If thou bring thy gift to the altar, and there rememberest that thy brother hath ought against thee” (उसी प्रकार के चिंतन के साथ) — यह प्रकार की विशिष्ट वाक्यांश देव-आशीष के साथ मानवीय सम्बन्धों के समन्वय की आवश्यकता दिखाते हैं।