Old Testament
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मत्ती 5:34 — शपथ के बारे में व्रति
इस पद में यीशु अपने प्रसिद्ध ऊँचे पर्वत उपदेश के भाग के रूप में यह स्पष्ट नियम प्रस्तुत करते हैं: शपथ लेने से परहेज़ करें। वह कहते हैं कि हम न तो स्वर्ग की शपथ दें, न ही पृथ्वी पर कोई अन्य शपथ जो परमेश्वर के सिंहासन से जुड़ी हो। उद्धरण में यशायाह 66:1 का संदर्भ है, जिसमें यह दर्शाया गया है कि परमेश्वर स्वयं सर्वोच्च दिव्य सत्ता है और हमारे शब्दों की निर्भरता केवल उसी पर होनी चाहिए।
केंद्रीय समझ
यह वचन दो बातों पर बल देता है: एक, शब्दों की निर्भीकता और सचाई का महत्त्व; दो, शपथ-सम्बन्धी सामान्य सामाजिक गरिमा की बजाय सीधे सरल सत्य पर आस्था। यीशु यह कहते हैं कि व्यवहार में पूर्ण ईमानदारी एक भरोसेमंद अनुशासन है तथा शब्दों के लिए कभी-कभी शपथ का सहारा लेना आवश्यक नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि ईश्वर की सत्ता हर सत्य के आधार है।
महत्वपूर्ण विषय
संदर्भित और परिशिष्ट विचार
कई पुरातन टीकाकारों में से एक सार यह है कि शपथ से छूटना हमारे भीतर स्थिर सत्य बोलने की संस्कृति बनाता है। मार्थेहनरी, एलबर्ट बर्न्स और एडम क्लार्क के टिप्पणियों में उन्होंने सजग चेतावनी दी है कि शब्दों के सत्य की कमी से सामाजिक विश्वास टूटता है, अतः आवश्यक हो कि हम हर पल सच बोलें।
अन्य संबंधित संदर्भ
– याकूब 5:12: शब्दों में न केवल शपथ की पूर्ति, बल्कि सामान्य सत्य की साधना की सलाह दी गई है।
– मत्ती 23:16–22: धार्मिक शपथ के भीतर वास्तविक ईमानदारी और सच्चे निष्ठा की दृष्टि स्पष्ट होती है।
– इब्रानी 6:16: शब्दों की शपथ से अधिक स्थायित्व के लिए परमेश्वर के बारे में विश्वास की अपेक्षा।
व्यावहारिक सुझाव
संक्षिप्त सार
मत्ती 5:34 का संदेश है कि परमेश्वर के राज्य के साथ रहने वाले लोग अपने शब्दों में ईमानदार और निर्भीक हों, शपथ की आवश्यकता को कम करें और हर परिस्थिति में सत्य के साथ चलें। यह जीवन-चर्या हमें परमेश्वर के अधिकार के नीचे पूर्ण निष्ठा और सामाजिक विश्वास के निर्माण के लिए प्रेरित करती है।
पल्लव: यह वचन हमारी दैनिक पहचान है—हमारे बोलण और कलाप परमेश्वर के सिंहासन के अनुरूप होने चाहिए; हमारे हर वचन में Him-only की गवाही हो।