Old Testament
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reader-friendly overview
मत्ती 5:35 में यीशु परमेश्वर के राज्य के विश्वसनीय, स्थिर और कभी-न बदलने वाले संदर्भ पर ध्यान धुरोटते हैं। वह स्पष्ट करते हैं कि परमेश्वर की सत्ता और महिमा एक ऐसी आकाश-सी बुनियाद पर टिकती है जो पृथ्वी-न कभी घिरती है, न ही किसी मनुष्य-राज्य की सीमा में बंधती है। इस पद में यरूशलेम और पृथ्वी दोनों को उद्धृत कर यह दिखाया गया है कि ईश्वर सब जगह का अधिकारी है और सत्य का केंद्र आकाश है, न कि किसी धरातल के स्थान का।
Verse in context
यह वाक्य मत्ती की पहली संग्रहण, चर्चित पहेली-धारणाओं के बीच आता है जहाँ यीशु अपनी teaching के अंतर्गत राज-सत्ता, स्थल और परमेश्वर के नाम को एक साथ रखकर स्पष्ट करते हैं कि भगवान का सर्वोच्च स्थान ऊपर है—आकाश। यह वक्तव्य, यशायाह 66:1 के स्वर के साथ, उस चेतावनी को दोहराता है कि कोई भौतिक स्थल ईश्वर का स्थान नहीं बन सकता; उनके राज्य का केंद्र स्वर्ग है और उनका अधिकार सब जगह फैला है।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
मुख्य संदेश यह है कि धार्मिकता, पूजा और सम्मान का भू-राज्य-आधार से संबंध नहीं होना चाहिए; बल्कि हमारे दिल की दृष्टि और परमेश्वर के सामने हमारी आस्था है। यीशु बताना चाहते हैं कि मानवीय संस्थान, न même मंदिर या शहर, ईश्वर के आराधना की पूर्णता का स्थान नहीं बन सकता। भक्त who seek righteousness must anchor their confidence in परमेश्वर की सत्ता और उसकी आकाशीय राजधानी।
अन्य बाइबल संदर्भों से तुलना
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि परमेश्वर के साथ वास्तविक प्रवाह दिल से है, न कि किसी विशिष्ट स्थल से.
Apply wisely (व्यावहारिक अनुप्रयोग)
कॉनसाइन्ड उद्धरण (संदर्भित टिप्पणीकार)
मैथ्यू हेनरी, एलबर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के प्रामाणिक विचारों के अनुसार, यह नुक्ता कि परमेश्वर का स्थान आकाश है और उसकी सत्ता सर्वत्र फैली है, धार्मिक हृदय की स्थिरता और ईश्वर-आस्था की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
यदि किसी पाठ की छोटी-सी पंक्ति उद्धृत हो तो उपलब्ध है, वह नीचे दी जा सकती है, पर मुख्य रूप से प्रयोजन यह समझना है कि भू-स्थान ईश्वर का स्थान नहीं बनाते; धर्म-निष्ठा दिल की स्थिति है।
Cross-references and brief notes
ये क्रॉस-रेफरेंसेस स्पष्ट करती हैं कि सच्चे आराधना के केंद्र से स्थायित्व मिलता है, न किसी स्थल की परिधि से।
Summary
यह पद हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर का शासन आकाश में है और उसका अधिकार सभी जगह फैला है। मनुष्य के मन में विश्वास और समर्पण के केंद्र में यदि हम परमेश्वर की महिमा और सत्य को रखें, तो हमारा धार्मिक जीवन वास्तविक, स्थिर और आकाश-निष्ठ बनता है।