मत्ती 5:21 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

“तुम सुन चुके हो, कि पूर्वकाल के लोगों से कहा गया था कि ‘हत्या न करना’, और ‘जो कोई हत्या करेगा वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा।’ (निर्ग. 20:13)

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मत्ती 5:21 पद-दर-पद बाइबल टीका

मत्ती 5:21 पर एक समेकित व्याख्या: हत्या से ऊपर शांति और न्याय

मुख्य interpretive point: यीशु ने शास्त्र विद्वान व्यवस्था के भीतर भी हत्या के अपराध को केवल बाह्य कानून-नियत से देखने की सीमा को उजागर किया है; उनका संकेत है कि दिल की धड़कन और इरादा भी अदालत के निर्णय के मापदंड बनने चाहिए। पुराने नियम में “हत्या न करना” कड़े नैतिक निर्देश के रूप में दिया गया है; यीशु इसे इधर-उधर की आचरण-नियमों के साथ साथ दिल की अविनय और क्रोध के स्रोतों से जोड़ते हैं, ताकि हमारे व्यवहार के पीछे की प्रेरणा सुधरे।

धार्मिक साहित्यिक संदर्भ (साहित्यिक संदर्भ के संदर्भ में)

यहVerse पुराने नियम के बाहर से आता है: “हत्या न करना” की आज्ञा सीधे निर्गमन 20:13 से ली गई है, जिसे मत्ती उद्धृत करते हैं ताकि यह दिख सके कि यीशु के शिक्षा के साथ पुरानी मान्यताओं की निरन्तरता और पूर्णता दोनो थी। इस संदर्भ में प्रकाशित पाठ्य के भीतर, शास्त्रज्ञों ने यह देखा है कि यीशु का उद्देश्य बाह्य कानून-पालन से अधिक मर्मस्थल पर बल देना है—चित्त के परिवर्तনের आवश्यकता।

कथात्मक-संदेश (लिटरेरी कोन्टेक्स्ट)

पहला भाग: उद्धृत नियम का पुनः स्मरण—हत्या न करना—जो प्रायः लोग कानून के बाहर के अपराध के रूप में देखते हैं। दूसरा भाग: क्रोध, ताना, और तिकर विचार—“जो किसी पर क्रोध करेगा” भी न्याय-प्रालंब की दृष्टि से दण्ड के काबिल माना जाएगा। अंततः शिक्षा यह है कि अपराध केवल हाथ से किए गए कार्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मन, विचार और हिंसात्मक आर्ति भी अपराध बनाते हैं।

थियोलॉजिकल महत्व

इस शिक्षा का तात्पर्य यह है कि पवित्रता का मानदंड बाह्य कर्मों से अधिक दिल की स्थिति है। क्रोध और बदले की भावना मृत्यु के समान गम्भीर परिणामों को जन्म दे सकती हैं, क्योंकि वे मानवीय संबंधों में अविश्वास और विभाजन पैदा करते हैं। यीशु इस बात पर बल देते हैं कि प्रवेश-मार्ग नहीं, बल्कि परिवर्तन-होना आवश्यक है—हृदय की स्वीकृति से ही सचेत और सही आचरण सम्भव है।

क्रॉस-रेफरेन्स (संक्षिप्त संदर्भ और संक्षिप्त स्पष्टीकरण)

  • यहोशू 1:18 – जीवन-आचरण के लिए एकजुटता और दायित्व की आवश्यकता पर बल।
  • याकूब 1:19-20 – क्रोध के कारण नैतिक निर्णयों की अशुद्धि का खतरा स्पष्ट करता है।
  • युसुफ 49:17 – परिवारिक शांति के लिए विचार-स्थितियों का नियंत्रण कितना आवश्यक है।

reflection questions (आत्म-चिंतन के लिए)

  • क्या मेरे दिल में क्रोध या कड़वाहट है जो मेरे रिश्तों को नुकसान पहुंचा रहा है?
  • क्या मैं ऐसे क्षणों में भी अहंकार के बजाय क्षमा और शान्ति की भाषा अपनाता हूं?
  • क्या मैं अपने व्यवहार के पीछे की प्रेरणा पर नजर रखता हूँ—क्या यह प्रेम और सत्य से प्रेरित है?

संक्षिप्त निष्कर्ष

यीशु हमें आतंरिक पवित्रता और बाह्य आचरण के संतुलन की शिक्षा देते हैं: हत्या सिर्फ हाथों से हुई क्रिया नहीं, बल्कि दिल की क्रोधपूर्ण वृत्ति भी हैं। एक सत्यनिष्ठ जीवन वही है जिसमें दिल की स्थिति और व्यवहार दोनों परमेश्वर के सामने पूरे purity के साथ रहते हैं।

नोट: इस पाठ में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के पुरातन-ग्रंथ-उद्धरणों के सटीक छोटे अंश उपलब्ध हों तो उद्धृत बताए गए हैं:

अल्प-उद्धरण (यदि उपलब्ध): -

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

मत्ती 5:21 समानांतर पद और संबंधित वचन

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व्यवस्थाविवरण 5:17 (HINIRV) »
'तू हत्या न करना। (मत्ती 5:21, याकूब. 2:11)

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निर्गमन 20:13 (HINIRV) »
“तू खून न करना।

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गिनती 35:30 (HINIRV) »
और जो कोई किसी मनुष्य को मार डाले वह साक्षियों के कहने पर मार डाला जाए, परन्तु एक ही साक्षी की साक्षी से कोई न मार डाला जाए। (व्य. 17:6, मत्ती 18:16)

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