Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
लैव्यव्यवस्था 1 लैव्यव्यवस्था 2 लैव्यव्यवस्था 3 लैव्यव्यवस्था 4 लैव्यव्यवस्था 5 लैव्यव्यवस्था 6 लैव्यव्यवस्था 7 लैव्यव्यवस्था 8 लैव्यव्यवस्था 9 लैव्यव्यवस्था 10 लैव्यव्यवस्था 11 लैव्यव्यवस्था 12 लैव्यव्यवस्था 13 लैव्यव्यवस्था 14 लैव्यव्यवस्था 15 लैव्यव्यवस्था 16 लैव्यव्यवस्था 17 लैव्यव्यवस्था 18 लैव्यव्यवस्था 19 लैव्यव्यवस्था 20 लैव्यव्यवस्था 21 लैव्यव्यवस्था 22 लैव्यव्यवस्था 23 लैव्यव्यवस्था 24 लैव्यव्यवस्था 25 लैव्यव्यवस्था 26 लैव्यव्यवस्था 27Verse
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लैव्यव्यवस्था 14:26 पर टिप्पणी
पवित्र राज्य की निर्गत व्यवस्था के भीतर यह वचन ईश्वरीय अनुदान के प्रतीक और पूजन-व्यवस्था की गहराई को बताता है। यहाँ याजक का कर्म विशिष्ट धार्मिक चिह्न के रूप में है: किसी प्रमुख अशुद्धि या पवित्रता के प्रमाण के लिए तेल से हाथ पर कुछ डालना, ताकि याजक और समाज दोनों के लिए शुद्धिकरण और पावन स्थिति बनाए रखी जाए। यह क्रिया यह बताती है कि पवित्र अनुष्ठान में भाग लेने से पूर्व एक पवित्रकरण की आवश्यकता होती है, ताकि परमेश्वर के सामने उपस्थिति मान्य और स्वीकार्य हो सके।
मुख्य विचार
इस verse में तेल का प्रयोग याजक के हाथ पर डालने की क्रिया से यह स्पष्ट होता है कि पवित्र कर्म के लिए विशिष्ट तकनीक और प्रतीक से उचित गरिमा आवश्यक है। तेल भय, पवित्रता, और आशीर्वाद के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त होता है; यहाँ इसका मान प्रयोजन है कि रहस्योद्घाटन और सेवकत्व के लिए व्यक्ति का पूरा आत्म-समर्पण और मानवीय अशुद्धियों से मुक्त होना आवश्यक है।
दो तीन प्रमुख विषय
अन्य संदर्भों के साथ संबंध
व्यावहारिक विचार
आज के संदर्भ में यह verse हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर के कार्य में भाग लेने से पहले हमारे भीतर की पवित्रता और नम्रता आवश्यक है। चर्च के सेवा-कार्य, प्रेरणादाता अध्ययन, या सामुदायिक सेवा में भी एक सजग मन और आत्म-समर्पण का भाव बनाए रखना चाहिए—यानी ঈश्वर की महिमा के लिए हमारे प्रयास पवित्र और शुद्ध हों।
संक्षिप्त समापन
यह पंक्ति धार्मिक कर्म के भीतर प्रतीकात्मक पवित्रता के महत्व को रेखांकित करती है—याजक के हाथ पर तेल डालना एक अभिषेक-प्रतीक है जो ईश्वर के संकट-समय के साथ सेवकत्व के लिए तैयारी और पवित्रता को संकेतित करता है। हमारी धार्मिक यात्रा में भी परमेश्वर के सामने जुड़ने से पहले उसकी गरिमा के अनुरूप होने की कोशिश जरूरी है।
संक्षिप्त क्रॉस-रेफरेंसेस
1) अभिषेक का प्रतीक: अन्य भागों में भी तेल और अभिषेक से सेवकत्व चुना जाना दर्शा गया है; यह ईश्वर की नियुक्ति और पवित्रता की पुष्टि करता है।
2) पवित्रता और सेवा: सेवा के लिए आह्वान में आंतरिक पवित्रता आवश्यक है, ताकि सेवा प्रकाशित होती रहे।
3) प्रतीक का महत्व: प्रतीकात्मक क्रिया वास्तविक आध्यात्मिक परिवर्तन की प्रस्तुति बनती है।
यही विचार Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के पारंपरिक टिप्पणियों के अनुरूप एक संयुक्त, धारणा-युक्त व्याख्या बनाते हैं: पवित्रता के प्रतीक के साथ सेवा-कर्तव्य की तैयारी परमेश्वर के सम्मुख स्वीकार्य बनाती है।