Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
लैव्यव्यवस्था 1 लैव्यव्यवस्था 2 लैव्यव्यवस्था 3 लैव्यव्यवस्था 4 लैव्यव्यवस्था 5 लैव्यव्यवस्था 6 लैव्यव्यवस्था 7 लैव्यव्यवस्था 8 लैव्यव्यवस्था 9 लैव्यव्यवस्था 10 लैव्यव्यवस्था 11 लैव्यव्यवस्था 12 लैव्यव्यवस्था 13 लैव्यव्यवस्था 14 लैव्यव्यवस्था 15 लैव्यव्यवस्था 16 लैव्यव्यवस्था 17 लैव्यव्यवस्था 18 लैव्यव्यवस्था 19 लैव्यव्यवस्था 20 लैव्यव्यवस्था 21 लैव्यव्यवस्था 22 लैव्यव्यवस्था 23 लैव्यव्यवस्था 24 लैव्यव्यवस्था 25 लैव्यव्यवस्था 26 लैव्यव्यवस्था 27Verse
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लैव्यव्यवस्था 2:16 — हवन के लिए अन्न, तेल और लोबान के भाग
यह पाठ लैव्यव्यवस्था के पवित्रता के नियमों के अंतर्गत एक विशिष्ट बलिदान-प्रणालिका का हिस्सा है। याजक मींजकर निकाले हुए अन्न को, तेल को और लोबान को स्मरण कर के अलग कर देता है, और इन सभी को भाग करके यहोवा के लिये हवन के रूप में जलाया जाता है। यह दिखाता है कि परमेश्वर की प्रसन्नता के लिये समर्पण और पवित्रता कितनी नाजुक और पवित्र चीजों से मिलती है।
ईश्वर और विश्वास के बारे में पाठ की शिक्षा
इस verse में परमेश्वर यह स्पष्ट करते हैं कि offerings केवल औपचारिक रीति नहीं, बल्कि एक अंतरात्मा की भेंट है। जो कुछ भी दिया जाता है, वह विद्यमान निर्भरता और समर्पण का प्रतीक है—खासकर उन सामग्री के साथ जो विशिष्ट तरीके से चिन्हित हैं। परमेश्वर चाहता है कि यह अन्न, तेल और लोबान—तीनों मिलकर एक संयुक्त, सांसारिक-आध्यात्मिक संदेश बनाएं: समर्पण, मंगलगान और प्रशंसा।
महत्वपूर्ण शब्द और चित्र
Related passages (cross-references)
इन संदर्भों से ज्ञात होता है कि पूजा में वस्तुएँ नहीं, बल्कि हृदय की अवस्था और परमेश्वर के साथ सही संबंध अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं।
आज के संदर्भ में अनुप्रयोग
यह पाठ याद दिलाता है कि ईश्वर के लिए समर्पण सरल वस्तुओं से नहीं, बल्कि एक समर्पित दिल से आता है। इतिहास-परंपरा से प्रेरित होकर, Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के टिप्पणियों का संक्षिप्त सार यह है कि भेंट-आहुति से हमारा उद्देश्य ईश्वर के साथ घनिष्ठ संबंध को बढ़ाना है, न कि केवल रीति-रिवाजों को पूरा करना। संदिग्ध शब्दों के भीतर भी एक पूर्ण श्रद्धा की ध्वनि स्पष्ट होती है: परमेश्वर के लिए जो कुछ भी दिया जाए, वही सच्चे हवन का भाग बन सकता है।
उद्धरण शुरू: Henry, Barnes, Clarke के संकलित विचार इन पंक्तियों में संक्षेप में मिलते हैं—पर वे शब्द-भेद से अधिक एक सामान्य संदेश देते हैं कि भेंट-आहुति का मूल उद्देश्य परमेश्वर के साथ प्रेम और विश्वास का बढ़ना है।