Old Testament
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मलाकी 2:17 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
तुम लोगों ने अपनी बातों से यहोवा को थका दिया है। तो भी पूछते हो, “हमने किस बात में उसे थका दिया?” इसमें, कि तुम कहते हो “जो कोई बुरा करता है, वह यहोवा की दृष्टि में अच्छा लगता है, और वह ऐसे लोगों से प्रसन्न रहता है,” और यह, “न्यायी परमेश्वर कहाँ है?”
मलाकी 2:17 पद-दर-पद बाइबल टीका
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मलाकी 2:17 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यशायाह 43:24 (HINIRV) »
तू मेरे लिये सुगन्धित नरकट रुपये से मोल नहीं लाया और न मेलबलियों की चर्बी से मुझे तृप्त किया। परन्तु तूने अपने पापों के कारण मुझ पर बोझ लाद दिया है, और अपने अधर्म के कामों से मुझे थका दिया है।

सपन्याह 1:12 (HINIRV) »
उस समय मैं दीपक लिए हुए यरूशलेम में ढूँढ़-ढाँढ़ करूँगा, और जो लोग दाखमधु के तलछट तथा मैल के समान बैठे हुए मन में कहते हैं कि यहोवा न तो भला करेगा और न बुरा, उनको मैं दण्ड दूँगा।

यशायाह 5:18 (HINIRV) »
हाय उन पर जो अधर्म को अनर्थ की रस्सियों से और पाप को मानो गाड़ी के रस्से से खींच ले आते हैं,
मलाकी 2:17 का पेडनामा — हालात और आध्यात्मिक संकेत
प vidare: इस पद में यहोवा के प्रति इंसानों की धारणाओं और उनके आचरण के असंगतपन को उजागर किया गया है। मलाकी यहूदियों के बीच धार्मिक लौट-फीर के समय के समकालीन संदर्भ में लिखी गई थी, जहाँ लोग यह मानते थे कि परमेश्वर सब कुछ स्वीकृत कर लेते हैं यदि उनके कर्म “अच्छे” लगते हैं या यदि वह अपने लोगों के तीर्थ-उत्सवों और कर्मों में सहनशील बनते हैं। यहाँ स्पष्ट किया गया है कि परमेश्वर की दृष्टि में “अच्छा” मानना ही वास्तव में सही नहीं है, और यह कि उनका यह कहना कि “न्यायी परमेश्वर कहाँ है?” एक पंक्ति-भर की आस्था का संकेत है जो वास्तविक न्याय और विपरीतताओं से दूर भागती है।
Immediate setting — संदर्भ का सार
यह संदेश ऐसा आशीर्वाद नहीं कि परमेश्वर किसी भी प्रकार के भ्रष्ट मान्यताओं पर प्रसन्न होते हैं; बल्कि यह चिह्न है कि लोग परमेश्वर को थकाने वाले कर्मों को गलत समझते हैं। वे यह मानते हैं कि बुरे कर्मों के लिए भी “अच्छा लगता है” कहकर परमेश्वर संतुष्ट रहता है, और यही उनके विश्वास का संकट है।
God’s character revealed — परमेश्वर की पवित्रता का प्रकाश
पद से समझ आता है कि परमेश्वर न्याय और सत्य के स्रोत हैं। वह ऐसा नहीं जो बहाने और कल्पना से सत्य के साथ खेलता हो। यदि लोग कहते हैं कि “बुरा करता है वह अच्छा लगता है,” तो वे परमेश्वर के सामने न्याय-प्रथा के विरुद्ध जा रहे हैं। यह स्पष्ट करता है कि परमेश्वर अपने नैतिक क्रम को बनाए रखते हैं और लोग जो भी कहें, परिणाम वही होंगे जो सत्य में निहित हैं।
Important terms and images — प्रमुख शब्दों की व्याख्या
Cross-references — प्रयुक्त संदर्भ और उनका संक्षेप
1) दानी-धर्म और परमेश्वर की आवश्यकता पर विचार: मिसाल के लिए होंठों से लाने वाले कर्मों की तुलना में दिल की भक्ति अधिक मानी जाए।
2) हबक्कुक 1–2 अध्याय: अन्याय के समय में परमेश्वर की क्रिया का सवाल। यह दिखाता है कि परमेश्वर न्याय और समय के बारे में स्पष्ट रहते हैं, भले ही मानवता उसे तात्कालिक रूप से न समझ सके।
3) रोमियों 12:2 जैसे पाठ: यह चिता देता है कि संसार की प्रणालियों के अनुसार नहीं, परन्तु परमेश्वर के कृपायुग के अनुरूप मन बदला जाए।
Present-day application — आज के संदर्भ में मिलान
आज के विश्वासियों के लिए यह संदेश दो मुख्य बातों पर ध्यान देता है: पहले, यहूद-धर्म-निष्ठा की बाहरी जाल से ऊपर उठकर दिल की सच्ची भक्ति का आग्रह है; दूसरे, समाज में होने वाले “न्याय” के भ्रम से दूर रहने की चेतावनी। हम यह न मानें कि धार्मिक कर्म और सामाजिक मान-प्रतिष्ठा ही न्याय का मापक हैं; बल्कि हमारे निर्णय और व्यवहार में ईश्वर की स्वतंत्रता, सत्यनिष्ठा और प्रेम का प्रमाण होना चाहिए।
Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke — संक्षेपीक विवरण
इन प्राचीन प्रकाशनों के अनुसार यह पाठ यह दिखाते हैं कि विश्वास और कर्म में संगति जरूरी है; केवल बाहरी धार्मिक प्रतीकों से परमेश्वर संतुष्ट नहीं होते। उन्होंने कहा है कि परमेश्वर का न्याय सत्य और नैतिकता पर टिकता है, न कि हमारे सोच-समझ या बहाने पर।
उद्धृत संकेत (यदि उपलब्ध): Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke से सीधे वाक्य उपलब्ध हों तो उन्हें पाठ में उद्धृत किया गया है।