Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
1 इतिहास 1 1 इतिहास 2 1 इतिहास 3 1 इतिहास 4 1 इतिहास 5 1 इतिहास 6 1 इतिहास 7 1 इतिहास 8 1 इतिहास 9 1 इतिहास 10 1 इतिहास 11 1 इतिहास 12 1 इतिहास 13 1 इतिहास 14 1 इतिहास 15 1 इतिहास 16 1 इतिहास 17 1 इतिहास 18 1 इतिहास 19 1 इतिहास 20 1 इतिहास 21 1 इतिहास 22 1 इतिहास 23 1 इतिहास 24 1 इतिहास 25 1 इतिहास 26 1 इतिहास 27 1 इतिहास 28 1 इतिहास 29Verse
1 इतिहास 15:1 1 इतिहास 15:2 1 इतिहास 15:3 1 इतिहास 15:4 1 इतिहास 15:5 1 इतिहास 15:6 1 इतिहास 15:7 1 इतिहास 15:8 1 इतिहास 15:9 1 इतिहास 15:10 1 इतिहास 15:11 1 इतिहास 15:12 1 इतिहास 15:13 1 इतिहास 15:14 1 इतिहास 15:15 1 इतिहास 15:16 1 इतिहास 15:17 1 इतिहास 15:18 1 इतिहास 15:19 1 इतिहास 15:20 1 इतिहास 15:21 1 इतिहास 15:22 1 इतिहास 15:23 1 इतिहास 15:24 1 इतिहास 15:25 1 इतिहास 15:26 1 इतिहास 15:27 1 इतिहास 15:28 1 इतिहास 15:29



सीधे अर्थ की एक पंक्ति
क्योंकि पिछली बार तुम ने उसे न उठाया था, इसलिए हमारा परमेश्वर यहोवा हम पर टूट पड़ा; क्योंकि हम उसकी खोज में नियम के अनुसार न लगे थे।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यह इतिहास का भाग उन घटनाओं से जुड़ा है जहाँ दाऊद के शासनकाल में आरती-यज्ञ और परमेश्वर के सामने निमंत्रणों के समय पवित्र व्यवस्था के अनुसार उठाने-चढ़ाने की परंपराएं निर्धारित थीं। अनुशासन और धार्मिक समर्पण में असावधानी के कारण यहोवा का क्रोध प्रकट हुआ। लेख की भाषा यह बताती है कि सीधे परमेश्वर की उपस्थिति में नीति-नियमों का उल्लंघन हमें परिणामों तक ले जाता है; उल्लंघन के कारण मंदिर-यज्ञ और सेवक मंडल के सामर्थ्य पर प्रभाव पड़ा।
व्याख्यात्मक बिंदु
मूल पाठ से संक्षेपित पाठ
यह पाठ यह दर्शाता है कि परमेश्वर के निर्देशों के अनुपालन में असावधानी हमारे आध्यात्मिक जीवन को बाधित कर सकती है और परिणामस्वरूप उसकी उपस्थिति मजबूत चूक से प्रभावित होती है।
संबद्ध आयतें (संकेतित तर्क के साथ)
1) अनुशासन का महत्व: पुराने नियम में स्मरण दिलाया गया है कि पवित्र व्यवस्था के अनुरूप चलना आस्था की परीक्षा है; यहोवा की महिमा के लिए नियमों का पालन आवश्यक है।
2) पारिवारिक नेतृत्व और सभा का सम्मान: अधिकारी और सेवक मंडल जो परमेश्वर के कार्य में लगे हैं, उनके लिए नियम-पालन अनिवार्य है; एक-दूसरे के द्वारा की गई चूक भी पूरे समुदाय को प्रभावित कर सकती है।
3) पश्चात्ताप और सुधार: गलती के पश्चात् पुनः नियमों के अनुसार चलना और पुनर्स्थापन की दृष्टि से विश्वासघाती नहीं बल्कि सुधार का मार्ग है।
2–3 प्रेरक विचार (Cross-references with brief explanations)
- नीतिवाक्य 15:5: ज्ञानहीन व्यक्ति नीचता का परिचय देता है; अनुशासन से जीवन बनता है।
- 2 इतिहास 13:20: परमेश्वर के कारण-कार्य में विघ्न आता है जब निर्देशों की उपेक्षा होती है; फिर से नियमों के अनुसार लौटना आवश्यक है।
- भजं 119:105: परमेश्वर की वचन हमारी राह दिखाती है; नियम-पालन से जीवन में उजाला रहता है।
संक्षिप्त निष्कर्ष और व्यवहारिक निष्कर्ष
हम जिस प्रकार के घेरे में हैं, उसमें परमेश्वर के नियमों का सम्मान और नियमित पालन महत्वपूर्ण है। क्रोध से बचना है तो पहले आस्था के साथ उसकी खोज में नियमों के अनुसार चलना होगा। सच्चे विश्वास का प्रमाण यह है कि हम-जो भी कार्य करें, परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार करें, ताकि उसकी उपस्थिति हमारे बीच स्थिर रहे।