Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
2 इतिहास 1 2 इतिहास 2 2 इतिहास 3 2 इतिहास 4 2 इतिहास 5 2 इतिहास 6 2 इतिहास 7 2 इतिहास 8 2 इतिहास 9 2 इतिहास 10 2 इतिहास 11 2 इतिहास 12 2 इतिहास 13 2 इतिहास 14 2 इतिहास 15 2 इतिहास 16 2 इतिहास 17 2 इतिहास 18 2 इतिहास 19 2 इतिहास 20 2 इतिहास 21 2 इतिहास 22 2 इतिहास 23 2 इतिहास 24 2 इतिहास 25 2 इतिहास 26 2 इतिहास 27 2 इतिहास 28 2 इतिहास 29 2 इतिहास 30 2 इतिहास 31 2 इतिहास 32 2 इतिहास 33 2 इतिहास 34 2 इतिहास 35 2 इतिहास 36



2 इतिहास 2:5 — भवनमहिमा और परमेश्वर की महानता
परिप्रेक्ष्य: संदर्भ यह है कि मिस्र के बाद राजा शलमाय तथा यहूदा का राजसी निर्माणकार्य चल रहा है। 2 इतिहास 2 अध्याय में सुलैमान के मंदिर के लिए विस्तृत preparatory योजना दी गई है। verse 5 एक सारग्रंथ के रूप में मंदिर के निर्माण की महिमा की उद्घोषणा करता है: जो भवन मैं बनाने पर हूँ, वह महान होगा; क्योंकि हमारा परमेश्वर सब देवताओं में महान है।
यह पाठ परमेश्वर या विश्वास के बारे में जो सिखाता है
यह वाक्य परमेश्वर की महानता को केंद्र में रखता है। मंदिर निर्माण का उद्देश्य केवल एक भौतिक संरचना नहीं, बल्कि परमप्रधान के पवित्र आभा-स्थल का संकेत है। भगवान की महानता सभी देवताओं से ऊपर है; ईश्वर की महिमा प्रकृति, शक्ति और नाम के हर सम्मान से परे है। यह पाठ यह भी बताता है कि परमेश्वर के निवास—या उसके पूजनीय स्थल—की स्थापना मानवता के लिए एक श्रद्धा-प्रशस्ति है जो उसकी महिमा को फैलाती है।
शब्दार्थ और चित्रण की स्पष्टता
Related cross-references (संक्षेप में)
• 1 राजा 8:27 — मंदिर की महिमा दायरे के पार थी; सुलैमान का_prayer दृश्य इस चीज़ को पुष्ट करता है कि परमेश्वर आकाश और पृथ्वी से बड़ा है। संक्षेप निष्कर्षित विचार: परमेश्वर की निहित महिमा उसकी स्थायी उपस्थिति और कृपा से परे है।
• इब्रानियों 9:24 — स्वर्गीय व्यवस्था में मसीह का प्रवेश मंदिर-परिकल्पनाओं के साथ मिलकर उद्धार-कार्य का पूर्ण समाधान दर्शाता है; ईश्वर के महिमा-प्रतिष्ठान का प्रभाव आज भी है।
• भजन 115:3 — हमारे परमेश्वर का महिमा-राज्य स्वभाव; वह आकाश में है और पृथ्वी पर भी उसकी सत्ता है।
आज के जीवन में अनुप्रयोग
1) धार्मिक जीवन में महिमा का लक्ष्य: हम अपने समुदाय के पवित्र स्थानों को केवल भवन नहीं मानते, बल्कि ईश्वर की महिमा के लिए एक माध्यम समझते हैं।
2) निष्ठा और प्रणय: अपने समय, संसाधनों और talents को ईश्वर की धरोहर के लिए समर्पित करें ताकि वह महान और सब देवताओं से ऊपर माना जाए।
3) प्रभुत्व की स्मरण-सीमाएं: जो परमेश्वर महान है, उसका सम्मान हमारी सोच, शब्द, और कर्मों में स्पष्ट होना चाहिए; न तो प्रतिस्पर्धी चढ़ाओ और न ही धन-शक्ति के प्रदर्शन से उसकी महिमा घटे।
सार-संयोजन
यह पंक्ति मंदिर के निर्माण के लिए प्रेरणा शक्ति है—परमेश्वर की महिमा सब जगह भरी है और वही सच्चे पूजे जाने के योग्य हैं। हमारे दैनिक जीवन में भी यह प्रश्न उठता है: क्या हम इसे अपने जीवन के हर क्षेत्र में मानते हैं? महिमा की आकाश-सी ऊँचाई की स्मृति हमें विनम्रता, चातुर्यता और समर्पण की ओर ले जाती है.
उद्धरण नोट: Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन मानक टिप्पणीकारों से निहित संकेत—फोकस के क्षण में—वे इसे मंदिर की महिमा और परमेश्वर की महानता के प्रतिपादन के रूप में उपयोग करते हैं। (यदि उपलब्ध हो, नीचे कोई प्रत्यक्ष संक्षिप्त उद्धरण उद्धृत किया गया है; अन्यथा विचार-खाका एकीकृत रूप से प्रस्तुत है।)