Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
2 तीमुथियुस 4:1 2 तीमुथियुस 4:2 2 तीमुथियुस 4:3 2 तीमुथियुस 4:4 2 तीमुथियुस 4:5 2 तीमुथियुस 4:6 2 तीमुथियुस 4:7 2 तीमुथियुस 4:8 2 तीमुथियुस 4:9 2 तीमुथियुस 4:10 2 तीमुथियुस 4:11 2 तीमुथियुस 4:12 2 तीमुथियुस 4:13 2 तीमुथियुस 4:14 2 तीमुथियुस 4:15 2 तीमुथियुस 4:16 2 तीमुथियुस 4:17 2 तीमुथियुस 4:18 2 तीमुथियुस 4:19 2 तीमुथियुस 4:20 2 तीमुथियुस 4:21 2 तीमुथियुस 4:22



2 तीमुथियुस 4:3 (HINIRV) — तत्कालीन परिस्थिति में सचेत रहना
पद के निकट तथ्य: यह पाठ पौलुस के निर्देशों के समापन हिस्से में है—जब वह तीमुथियुस को विश्वास के प्रचार के लिए प्रेरित कर रहा है। यहां स्पष्ट चेतावनी है कि ऐसा समय आयेगा जब लोग सत्य उपदेश को नहीं सह पाएंगे, बल्कि अपनी कुंठित इच्छाओं के अनुसार उपदेशकों को चाहते-चाहते बुलाते रहेंगे, ताकि उनके कान खुजलाते रहें।
ईश्वरीय धारा में संकेतित आध्यात्मिक दशा
यह चेतावनी केवल पहली शताब्दी के लिए नहीं है, बल्कि उपदेश-केन्द्रित संसार की स्थिर प्रवृत्ति का आकलन है। कथा बताती है कि मनुष्यों की आत्मिक प्राथमिकताएं विकृत हो सकती हैं, जब वे सत्य से अधिक अपने शारीरिक और मनोवैज्ञानिक संतुष्टि के लिए उपदेश ढूंढते हैं। इस प्रकार, परमेश्वर के वचन की प्रेरणा और शुद्ध शिक्षा को बजाय उनके “खरी उपदेश” के प्रति आकर्षण सक्रिय रहता है।
महत्वपूर्ण शब्दों और विचार छवि की स्पष्टता
Cross-reference और सम्बन्धित दृश्य
– यशायह 30:9-10: कई बार लोग भविष्यवाणियाँ पसंद नहीं करते, परन्तु वे अपनी इच्छाओं के अनुसार मार्ग ढूंढते हैं।
– यूहन्ना 4:23-24: सत्य-उपासना आत्मा और सच्चाई के अनुसार होती है; सत्यान्वेषी को सत्य की खोज करनी चाहिए, न कि लोगों के मनपसंद शिक्षण की।
– 1 कुरिन्थियों 14:6: यदि उपदेशक कुछ नहीं बोले, तो समझना चाहिए कि प्रेरणा और स्पष्टता कैसे प्राप्त होती है।
पाठ से जुड़ी विचारधारात्मक स्पष्टता
यह वाक्य हमें यह दिखाता है कि विश्वास के प्रचार का कार्य समय-समय पर आलोचनाओं और चुनौतियों से गुजरता है। सही शिक्षण वह है जो सत्य के साथ जुड़ा रहे, न कि बाहरी आकर्षणों के कारण आत्मसात किया जाए। प्रभु के शब्द का मूल उद्देश्य व्यक्ति की आत्मिक वृद्धि और न्यायपूर्ण जीवन की स्थापना है, न कि मनोरंजन या व्यक्तिगत लाभ।
आज के संदर्भ में व्यवहारिक अनुप्रयोग
संक्षिप्त निष्कर्ष
2 तीमुथियुस 4:3 हमें सच-उपदेश की महत्ता और मानव प्रवृत्ति की जोखिम Prevention सिखाती है। सत्य के शिक्षण के लिए आत्मिक दृढ़ता और इमानदारी आवश्यक है, ताकि हम प्रमाणित ईश्वरीय आवाज से विचलित न हों और अपने विश्वास को पूर्ण बनाते रहें।
उद्धरण संकेत: यह पाठ ग्रीक के मूल विचारों से प्रेरित है और पुराने विश्वासी टिप्पणीकारों के सार से संगठित है।