Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
व्यवस्थाविवरण 1 व्यवस्थाविवरण 2 व्यवस्थाविवरण 3 व्यवस्थाविवरण 4 व्यवस्थाविवरण 5 व्यवस्थाविवरण 6 व्यवस्थाविवरण 7 व्यवस्थाविवरण 8 व्यवस्थाविवरण 9 व्यवस्थाविवरण 10 व्यवस्थाविवरण 11 व्यवस्थाविवरण 12 व्यवस्थाविवरण 13 व्यवस्थाविवरण 14 व्यवस्थाविवरण 15 व्यवस्थाविवरण 16 व्यवस्थाविवरण 17 व्यवस्थाविवरण 18 व्यवस्थाविवरण 19 व्यवस्थाविवरण 20 व्यवस्थाविवरण 21 व्यवस्थाविवरण 22 व्यवस्थाविवरण 23 व्यवस्थाविवरण 24 व्यवस्थाविवरण 25 व्यवस्थाविवरण 26 व्यवस्थाविवरण 27 व्यवस्थाविवरण 28 व्यवस्थाविवरण 29 व्यवस्थाविवरण 30 व्यवस्थाविवरण 31 व्यवस्थाविवरण 32 व्यवस्थाविवरण 33 व्यवस्थाविवरण 34Verse
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विधायित व्यवस्थाविवरण 2:31 का संदर्भ और अर्थ
इस पद में परमेश्वर बोलते हैं कि जो देश सीहोन है, उसे हाँथ में लेने की योजना उनके वश में है। यह वरदान नहीं, बल्कि प्रभुत्व का उद्घोष है: परमेश्वर अपने चुनिंदे लोगों के लिए प्रचंड विजय और पृथ्वी के शक्तिशाली स्थानों पर नियंत्रण का ऐलान करते हैं। इसे पढ़ते समय ध्यान रहता है कि परमेश्वर का मार्ग अभियान-प्रधान और ईमानदारी से निभने योग्य निर्देशों से संचालित है, न कि मानव-योजना और ताकत से.
ईश्वर के सामने विश्वास और पद-निर्देशन
यह वाक्य दिखाता है कि ईश्वर अपने लोगों के लिए मार्ग बनाते हैं, उनके लिए निर्णय लेते हैं, और उन्हें लक्ष्य तक पहुँचा देते हैं। विश्वास में जो साहस पैदा होता है, वह भौगोलिक सीमाओं के पार भी विजय की आशा देता है; यह दिखाता है कि ईश्वर की योजना मानव सीमाओं से ऊपर है और वह अपने लोगों के लिए सही समय और सही जगह चुनते हैं।
महत्वपूर्ण शब्द और चित्र स्पष्ट करना
अन्य सुसंगत पद
यहोवा के समर्थ और विजय के संदर्भ में कुछ संदर्भ जो इस विचार को दृढ़ करते हैं:
प्रासंगिक क्रॉस-रिफरंसेस और उनका संछिप्त विवेचन
क्योंकि यह पाठ प्रभुत्व और वचन की पुष्टि से जुड़ा है, नीचे के संदर्भ उन धारणाओं के साथ मेल खाते हैं:
आज की भूमिका और प्रयोग
हमारे जीवन में यह संदेश स्पष्ट करता है कि परमेश्वर के वचन पर दृढ़ विश्वास रखें; जब वह कहता है कि वह किसी स्थान या स्थिति को अपने अधिकार में लाने वाला है, तब हमारे हिस्से का कार्य है उसी विश्वास के साथ आगे बढ़ना। डर से मुक्त रहते हुए, हमें स्थानीय और व्यक्तिगत “सीहोन”—जो भी हमारे सामने बाधा हैं—उन पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए आधीन भाव से आगे बढ़ना चाहिए। यह न केवल एक प्रतीकात्मक विजय है, बल्कि विश्वास की सक्रियता है: प्रार्थना, आज्ञाओं का पालन, और असत्य के विरुद्ध सत्य का सामर्थ्य।
नोट: इस खंड में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों के कभी-कभी उद्धृत विचार संक्षेप रूप में सम्मिलित किए गए हैं; आवश्यक जगहों पर उनके स्पष्ट शब्द सीधे उद्धृत नहीं हैं ताकि पाठ की स्वाभाविक धारा बनी रहे।