Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
व्यवस्थाविवरण 1 व्यवस्थाविवरण 2 व्यवस्थाविवरण 3 व्यवस्थाविवरण 4 व्यवस्थाविवरण 5 व्यवस्थाविवरण 6 व्यवस्थाविवरण 7 व्यवस्थाविवरण 8 व्यवस्थाविवरण 9 व्यवस्थाविवरण 10 व्यवस्थाविवरण 11 व्यवस्थाविवरण 12 व्यवस्थाविवरण 13 व्यवस्थाविवरण 14 व्यवस्थाविवरण 15 व्यवस्थाविवरण 16 व्यवस्थाविवरण 17 व्यवस्थाविवरण 18 व्यवस्थाविवरण 19 व्यवस्थाविवरण 20 व्यवस्थाविवरण 21 व्यवस्थाविवरण 22 व्यवस्थाविवरण 23 व्यवस्थाविवरण 24 व्यवस्थाविवरण 25 व्यवस्थाविवरण 26 व्यवस्थाविवरण 27 व्यवस्थाविवरण 28 व्यवस्थाविवरण 29 व्यवस्थाविवरण 30 व्यवस्थाविवरण 31 व्यवस्थाविवरण 32 व्यवस्थाविवरण 33 व्यवस्थाविवरण 34Verse
व्यवस्थाविवरण 26:1 व्यवस्थाविवरण 26:2 व्यवस्थाविवरण 26:3 व्यवस्थाविवरण 26:4 व्यवस्थाविवरण 26:5 व्यवस्थाविवरण 26:6 व्यवस्थाविवरण 26:7 व्यवस्थाविवरण 26:8 व्यवस्थाविवरण 26:9 व्यवस्थाविवरण 26:10 व्यवस्थाविवरण 26:11 व्यवस्थाविवरण 26:12 व्यवस्थाविवरण 26:13 व्यवस्थाविवरण 26:14 व्यवस्थाविवरण 26:15 व्यवस्थाविवरण 26:16 व्यवस्थाविवरण 26:17 व्यवस्थाविवरण 26:18 व्यवस्थाविवरण 26:19



व्यवस्थाविवरण 26:12 का अर्थ और संदर्भ
सीधे शब्दों में कहें तो यह वचन पात्री-या दशमांश के बारे में है: तीसरे वर्ष जब दशमांश से पहले अपने सभी बढ़ते आहार-फलों का हिस्सा निकाल कर न लिया गया हो, तब उन दान-योग्य भागों (लेवीय, परदेशी, अनाथ, विधवा) को देना चाहिए ताकि वे तेरे फाटकों के भीतर खाकर तृप्त हों। यह नीति यह दर्शाती है कि परमेश्वर के लोग बाजार-धन या स्वयं के समृद्धि के साथ-साथ समुदाय के कमजोर वर्गों की भलाई का भी ध्यान रखते थे।
स्थिति-परिप्रेक्ष्य (Contextual background)
यह कानून मोशे के नेतृत्व में इस्राइल के त्रिष्ठाप्रकरण के लोकोपयोगी प्रावधानों में आता है। दशमांश का एक भाग समुदाय के उद्धार और उद्धारक रूप से संबद्ध था: हर तृतीय वर्ष को दशमांश के अतिरिक्त एक विशिष्ट भाग, जिसे “तीसरे वर्ष” कहा गया, सामाजिक-न्याय के साथ जुड़ा। इस वर्ष गाँव-गाँव के भीतर रहने वाले हक़दारों, विशेषकर लेवी, प्रवासी, अनाथ व विधवाओं को राहत देने के लिए निर्धारित किया गया था।
व्याख्यात्मक बिंदु (Interpretive observations)
छोटे थीमैटिक बिंदु (Thematic highlights)
संबंधित पद (Cross-references) और संक्षिप्त व्याख्या
- चरात्रवचन में मानवीय सहायता के सिद्धांत को उजागर करने वाले अन्य संदर्भ:
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि दान का अर्थ केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि समुदाय-जीवन का एक नैतिक-धार्मिक ढांचा बनना है जिसमें हर सदस्य की गरिमा बनी रहे।
संक्षिप्त व्यावहारिक निष्कर्ष (Practical takeaway)
तीसरे वर्ष के दशमांश से मिलने वाला भाग अन्याय-विहीन, नि:स्वार्थ सेवा का प्रतीक है। आज भी अपने क्षेत्र की जरूरतमंद संस्थाओं, प्रवासी, वृद्ध, अनाथ के प्रति खुला-हृदय होना एक विश्वास-गत कदम है।
मुख्य विचारों का संक्षेप
यह वचन दिखाता है कि धार्मिक आज्ञाएँ केवल व्यक्तिगत आचरण नहीं, बल्कि समुदाय के हर सदस्य के लिए सुरक्षा-नीति बनती हैं। दशमांश के वितरण से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर की बनाये व्यवस्था में आर्थिक-समृद्धि का वास्तविक अर्थ तब है जब वह समुदाय के कमजोर वर्गों के लिए लाभकारी हो।