Old Testament
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सभोपदेशक 1:8 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
सब बातें परिश्रम से भरी हैं; मनुष्य इसका वर्णन नहीं कर सकता; न तो आँखें देखने से तृप्त होती हैं, और न कान सुनने से भरते हैं।
सभोपदेशक 1:8 पद-दर-पद बाइबल टीका
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सभोपदेशक 1:8 समानांतर पद और संबंधित वचन
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मत्ती 11:28 (HINIRV) »
“हे सब परिश्रम करनेवालों और बोझ से दबे* लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।

सभोपदेशक 4:8 (HINIRV) »
कोई अकेला रहता और उसका कोई नहीं है; न उसके बेटा है, न भाई है, तो भी उसके परिश्रम का अन्त नहीं होता; न उसकी आँखें धन से सन्तुष्ट होती हैं, और न वह कहता है, मैं किसके लिये परिश्रम करता और अपने जीवन को सुखरहित रखता हूँ? यह भी व्यर्थ और निरा दुःख भरा काम है।

सीधे अर्थ की बात
सभोपदेशक 1:8 कहता है कि संसार की सभी घटनाओं में, अनुभवों में और कल्पनाओं में भी परिश्रम से भरे प्याले सच और अनंत हैं; पर मनुष्य उनका पूरा वर्णन नहीं कर सकता। न आँखें कभी पूरी तरह से तृप्त होती हैं, न कान कभी पूरे होकर सुनते हैं। यानि जीवन की वृतियाँ अनंत हैं, हमारी समझ सीमित है।
संदर्भ-परिपार्श्व
यह पद सभोपदेशक की पुस्तक की शुरुआत में आता है जहाँ लेखक जीवन के प्रयोजन, समय और निरर्थकता पर विचार करता है। जलझूल (फायदे), संसाधन, और ज्ञान की खोज सभी एक सीमा से बंधे हैं। यहाँ व्याख्याता एक सार्वभौमिक अनुभव दे रहा है: बाह्य संसार के सभी रंग और ध्वनि भी असीमित गहराईयों को नहीं समेट पाते।
व्याख्यात्मक अवलोकन
छः तात्पर्यपूर्ण विषय
अन्य प्रमुख संदर्भ और उनके अर्थ
नीचे तीन प्रत्यक्ष संदर्भ समझने में सहायक:
इन संकेतों से समझ में आता है कि जीवन की अनेक गहराइयों के पीछे परमेश्वर की योजना है और हमारी सहज समझ उसे पूरी तरह पकड़ नहीं पाती।
संक्षिप्त व्यावहारिक निष्कर्ष
गहरी खोजों के दौरान भी आत्म-संतुष्टि और जीवन के उद्देश्य की खोज एक साथ चलती है। हमें ज्ञान की सीमाओं को स्वीकार कर, परमेश्वर की व्यवस्था में भरोसा रखना चाहिए और रोजमर्रा के अनुभवों में भी धैर्य से आगे बढ़ना चाहिए।
मूल उद्धरण-उद्धृत टिप्पणियाँ
इसे संग्रहीत संस्कृति-उद्धृत टिप्पणीकारों के प्रमुख विचारों के साथ संकलित किया गया है:
मैथ्यू हेनरी और एडम क्लार्क के सामान्य विचारों के अनुसार, संसार की परिश्रमपूर्ण खोज का लक्ष्य आत्मा के शांति और परमेश्वर की योजना की अनुभूति है; उनकी सारगर्भित पंक्तियाँ इस बिंदु को रेखांकित करती हैं कि मानव की समझ और चेतना सीमित है, जबकि परमेश्वर की मार्गदर्शक उपस्थिति असीम है।
नोट: इस भाग में कोई पूर्ण पाठ उद्धरण नहीं दिया गया है; केवल संरचित सार-संवेदना प्रस्तुत की गई है।