Old Testament
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सभोपदेशक 1:3 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
उस सब परिश्रम से जिसे मनुष्य धरती पर करता है, उसको क्या लाभ प्राप्त होता है?
सभोपदेशक 1:3 पद-दर-पद बाइबल टीका
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सभोपदेशक 1:3 समानांतर पद और संबंधित वचन
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सभोपदेशक 5:16 (HINIRV) »
यह भी एक बड़ी बला है कि जैसा वह आया, ठीक वैसा ही वह जाएगा; उसे उस व्यर्थ परिश्रम से और क्या लाभ है?


सार-आधार: सभोपदेशक 1:3 का अर्थ
यह पद कहता है: उस सब परिश्रम से जिसे मनुष्य धरती पर करता है, उसको क्या लाभ प्राप्त होता है? इसका सीधा तात्पर्य है—मनुष्यमय जीवन की कर्म-चेष्टा और बाहरी साधनों की कर्तव्यपरायणता भी किस लाभ तक पहुँचाती है जब उसका उद्देश्य स्थायी, शून्य-व्याकुलता से मुक्त जीवन नहीं है। लेखक समुदाय-जीवन के निरंतर विलोपन को उजागर करते हुए विचार देता है कि अस्थायी गतिविधियाँ, भौतिक उपलब्धियाँ, और मानव-परिश्रम एक दिन के लिए ही होती हैं; परन्तु आत्म-ज्ञान, परमेश्वर-भक्ति और सच्ची समझ से नहीं भरी जातीं तो वे व्यर्थ हो जाती हैं।
पैग़ंबर-परिदृश्य और संदर्भ
सभोपदेशक का लेखन सामान्य रूप से जीवन की नश्वरता, परिभाषाओं की कमी, और संसारिक धारणाओं के भीतर सत्य की खोज पर केंद्रित है। यहाँ “परिश्रम” का शब्द-प्रयोग व्यावहारिक प्रयासों, व्यापार, अध्ययन और दैनिक कर्तव्य के लिए है, जिन्हें हम सामान्यतः महत्त्व देते हैं। लेखक कहता है कि ऐसे सभी प्रयास अक्सर बेमतलब लगते हैं जब उद्देश्य परम चेतना या ईश्वर-सम्पर्क नहीं है।
Interpretive observations
एक छोटा thematic-निज़ाम
अन्य सन्दर्भ और उनके निहितार्थ
Related passages ऐसे प्रश्न उठाते हैं कि जीवन की ਰीतियाँ और तृष्णा किन मार्गों पर चलती हैं:
चयनित उद्धरण (ध्यान हेतु)
मार्थवे दार्शनिक-उद्धरण:
“जो कुछ भी मनुष्य धरती पर करता है, वह परमात्मा के साथ सतत सम्बन्ध के बिना व्यर्थ हो सकता है।”
एडम क्लार्क और अन्य पवित्र-विकल्पों के सार्वजनिक-डायरी-टिप्पणियाँ इस प्रकार के विचारों को पुख्ता करते हैं कि जीवन का वास्तविक मूल्य अंतःस्थ है, न कि बाह्य परिणामों में।
cross-references (संक्षेप परिचय)
1) नीति 3:9–10 — जीवन के प्रयोजनों के बारे में विचारों को संतुलित करना।
2) यूहन्ना 15:5 — बिना मुझ के तुम कुछ भी नहीं कर सकते; आत्म-निर्भर परिश्रम के स्थान पर परमेश्वर-चेतना आवश्यक है।
3) प्रका 16:3 — अपने कृत्यों को परमेश्वर के चरणों में समर्पित करना स्थायी फल देता है।
व्यावहारिक निष्कर्ष
इस पद का संदेश सरल है: मेहनत आवश्यक है, पर उसकी दिशा ईश्वर-प्राप्ति और चरित्र-निर्माण होनी चाहिए। अपना काम दिल से करो, लेकिन परिणामों को परमेश्वर के हाथों में छोड़ दो। यदि परिश्रम के साथ ईश्वर-भक्ति जुड़ी हो, तो वह जीवन भर के लिए सार्थकता देता है।
नोट: प्रमुख सार्वजनिक-डायरी टिप्पणीकारों के संक्षिप्त कथन और विचारों को प्रस्तुत करते समय हमने नीतिपूर्वक उनकी सरलत्वपूर्ण विचार-रेखा का समन्वय किया है; विशिष्ट उद्धरण जिनके लिए उपलब्ध हैं, वे ऊपर उल्लेखित हैं।