Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
सभोपदेशक 3:1 सभोपदेशक 3:2 सभोपदेशक 3:3 सभोपदेशक 3:4 सभोपदेशक 3:5 सभोपदेशक 3:6 सभोपदेशक 3:7 सभोपदेशक 3:8 सभोपदेशक 3:9 सभोपदेशक 3:10 सभोपदेशक 3:11 सभोपदेशक 3:12 सभोपदेशक 3:13 सभोपदेशक 3:14 सभोपदेशक 3:15 सभोपदेशक 3:16 सभोपदेशक 3:17 सभोपदेशक 3:18 सभोपदेशक 3:19 सभोपदेशक 3:20 सभोपदेशक 3:21 सभोपदेशक 3:22



सभोपदेशक 3:13 का सरल अर्थ और संदर्भ
यह आयतन का वह आशय है जो सभा के लेखक, हलिलये-समय के अनुभवों के बीच महीन से उभर कर आता है: परमेश्वर की व्यवस्था में हर चीज का समय है, और लोगों को यह आशीर्वाद मिलता है कि वे एक संतुलित जीवन जिएँ—खाने-पीने से लेकर परिश्रम तक—तथा उन सब में संतुष्टि और सुख मिले। इस पद में यह स्पष्ट संदेश है कि दैनिक जीवन के साधारण क्रिया-कलाप भी परमेश्वर के दान के रूप में हैं, और इनका सार यही है कि मनुष्य अपने परिश्रम के फलस्वरुप आनंद पाए और जीवन के विविध अवसरों में ईश्वर का आशीर्वाद अनुभव करे।
मुख्य अर्थ
इस वाक्य की केंद्रीय तह यह है कि भोजन, पेय, और मौलिक जीवन-चाल में संतोष पाना परमेश्वर की इच्छा है। यह दिखाता है कि शुद्ध भौतिक जीवन भी आशीष है, यदि उसे ईमानदारी और धैर्य के साथ सँभाला जाए और परमेश्वर के साथ जीवन का संतुलन बना रहे।
दो-तीन प्रमुख विषय
संदर्भ पाठ और सुसंगत संकेत
1) यीशु के उपदेशों के पीछे का विचार—संतोष, दैनिक आवश्यकता से जुड़ा जीवन—यूहन्ना 6:27 जैसे शिक्षणों में भी देखा जा सकता है।
2) नीतिवचन 10:22 की तरह, धन-सम्पत्ति से मिलने वाला सुख वास्तविक संतोष बन कर रहता है जब उसका स्रोत परमेश्वर हो।
3) परिश्रम-फल की बात, कुलकथा 9:7-9 के साथ जोड़कर देखें: जीवन के हर समय में ईश्वर की देन का आनंद उठाने का exhortation है, पर यह भी याद दिलाता है कि युवा-यौवन में यह आनंद शुद्ध विश्वास के साथ आए।
व्यावहारिक विचार
- प्रतिदिन के भोजन और परिश्रम के प्रति एक आभार-पूर्वक दृष्टिकोण विकसित करें।
- जीवन के छोटे-बड़े सुखों में भी ईश्वर की कृपा के संकेत तलाशें—संतोष की साधना करें, न कि अधिक के लिए अनावश्यक शिकायतें।
संक्षिप्त निष्कर्ष
सभोपदेशक 3:13 हमें याद दिलाता है कि जीवन के नित्य कर्म—खाने-पीने और परिश्रम—ईश्वर का दान हैं और इन में संतोष पाना वास्तविक सफलता है। यह संदेश संतुलन, gratitude, और ईश्वर-आश्रित जीवन की दिशा देता है।
क्रॉस-रेफरेंसेस
- नीतिवचन 16:3: अपने कर्म परमेश्वर के लिये करें और उसकी इच्छा अनुसार फल पाएंगे।
- फिलिप्पियों 4:11-13: परिस्थिति चाहे जैसी हो, संतोष सीखना संभव है क्योंकि मैं हर स्थिति में सक्षम हूँ—प्रभु द्वारा।
- מלכות 17:7-16 के प्रकार के पुनर्जागरण-युग के अनुभव: प्रभु की आपूर्ति समय पर मिलती है और विश्वास बढ़ता है।
यह टिप्पणी तात्कालिक उपयोग के लिए है, ताकि पाठक इस वचन के भीतर के सरल, पर गहरे तत्त्व को समझ सकें—ईश्वर के दान के रूप में दैनिक जीवन की साधारणताओं में भी आनंद और संतोष पाना संभव है जब हम उसे तुच्छ नहीं मानते।
उद्धृत संक्षेप (यदि उद्धरण आवश्यक हो तो): Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक-domain टिप्पणी-उद्धरणों के अनुसार, इस वाक्य के मूल तत्त्व स्पष्ट रहते हैं: दैनिक जीविका को आशीष मानना, संतोष बनाए रखना, और परमेश्वर के क्रम के अनुसार जीवन जीना।