Old Testament
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सभोपदेशक 4:5 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
मूर्ख छाती पर हाथ रखे रहता और अपना माँस खाता है।
सभोपदेशक 4:5 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
सभोपदेशक 4:5 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यशायाह 9:20 (HINIRV) »
वे दाहिनी ओर से भोजनवस्तु छीनकर भी भूखे रहते, और बायीं ओर से खाकर भी तृप्त नहीं होते; उनमें से प्रत्येक मनुष्य अपनी-अपनी बाँहों का माँस खाता है,

अय्यूब 13:14 (HINIRV) »
मैं क्यों अपना माँस अपने दाँतों से चबाऊँ? और क्यों अपना प्राण हथेली पर रखूँ?

Reader-friendly overview
सभोपदेशक 4:5 में एक साधारण, पर कठोर चित्रण प्रस्तुत है: मूर्ख जो हाथ पर हाथ रखे बैठा रहता है, वह अपनी माँस खाकर भी सुख-शांति नहीं पाता। यह वाक्य पृथक्करण और निष्क्रियता के कारण जीवन में कटौती दिखाने वाला है—काम-व्यवहार के अभाव में व्यक्ति न तो अपने समय का उपयोग करता है और न ही अपने आंतरिक विकास को प्रोत्साहन देता है। लेखक यहाँ एक ऐसी स्थिति उजागर करता है जिसमें जीवंत प्रयत्न और रचनात्मकता का अभाव भलाई के रास्ते को अवरुद्ध कर देता है।
पद का पाठ और उसके संदर्भ
यह पद Qoḥ ע، 4:5 में स्पष्ट करता है कि मूर्ख ने न तो ऊर्जा दिखाई, न योजना अपनाई—बल्कि वह बैठे-बैठे अपने काम नहीं करने से आत्म-हृदय को नुकसान पहुँचाता है। यह एक सामान्य मानवीय प्रवृत्ति की आलोचना है: बिना विचार, बिना प्रवृत्ति के जीवन जिए जाना। साथ ही यह चेतावनी है कि निष्क्रियता से केवल भौतिक भोजन नहीं मिल सकता; आत्मिक आहार भी कम होता है जब हम अपने दायित्वों और करुणाओं से दूरी बनाते हैं।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
इस verse में स्पष्ट शिक्षण यह है: बुद्धिमान जीवन वही है जिसमें योजनाबद्ध, परिश्रमी और समाज के साथ जुड़ा हुआ क्रम बना रहता है। मूर्खता यहाँ केवल अकर्मण्यता नहीं, बल्कि आत्म-उन्नति के अवसरों को पाने में असफलता से जुड़ी है। संदर्भ में, सभोपदेशक का उद्देश्य जीवन की fleetingता से सीखना और एक संतुलित, उद्देश्य-सम्पन्न जीवन जीना है।
उद्धरण से समीपस्थ समान विचार
याचना और श्रम के महत्व पर पुराने दार्शनिक-धर्मग्रंथों में भी समरूप विचार मिलते हैं। ईश्वरीय नियोजन के अनुरूप जीवन जीना—यही नैतिक स्वास्थ्य की कुंजी है।
कड़ी-का-केसा संदर्भ (Cross-references)
व्यावहारिक आवेदन
संक्षिप्त निष्कर्ष
इस verse में दिखी मूर्खता और निष्क्रियता वह अवस्था है जो जीवन की सच्ची पूर्ति को रोक देती है। सचमुच स्मरणीय यह है कि प्रयत्न, योजना और समुदाय के साथ जीवन गुज़रना ही सत्य और संतोषपूर्ण जीवन की कुंजी है।
शब्द-शंग्रह और उद्धरण नोट
इस पाठ में सीधे Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के पूर्ण उद्धरण यहाँ नहीं दिए गए हैं; यदि उनका कोई संक्षिप्त विचार पाठ के अनुसार जोड़ा गया होता तो वह चिन्हित किया जाता।