Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
सभोपदेशक 7:1 सभोपदेशक 7:2 सभोपदेशक 7:3 सभोपदेशक 7:4 सभोपदेशक 7:5 सभोपदेशक 7:6 सभोपदेशक 7:7 सभोपदेशक 7:8 सभोपदेशक 7:9 सभोपदेशक 7:10 सभोपदेशक 7:11 सभोपदेशक 7:12 सभोपदेशक 7:13 सभोपदेशक 7:14 सभोपदेशक 7:15 सभोपदेशक 7:16 सभोपदेशक 7:17 सभोपदेशक 7:18 सभोपदेशक 7:19 सभोपदेशक 7:20 सभोपदेशक 7:21 सभोपदेशक 7:22 सभोपदेशक 7:23 सभोपदेशक 7:24 सभोपदेशक 7:25 सभोपदेशक 7:26 सभोपदेशक 7:27 सभोपदेशक 7:28 सभोपदेशक 7:29



reader-friendly overview
सभोपदेशक 7 अध्याय में नीतिगत विवेक की खोज और जीवन के अनेक अनुभवों को समेटा गया है. यह क्षेत्र-जगत की तीव्रताओं में भी संतुलन बनाए रखने की बुद्धिमानी पर प्रकाश डालता है. इस Verse सभोपदेशक 7:17 में लेखक सचेत करता है कि अत्यंत दुष्ट न बनना और मूर्ख न होना—परम इच्छा यह है कि मनुष्य अपने समय की सीमा के भीतर ईमानदारी और विवेक से जीवन जिए. यह एक प्रकार का प्रैक्टिकल, आत्म-चेतन मार्गदर्शन है, जिसमें भयावह दुष्टता या अति मूर्खता के खतरों से बचना अधिक महत्वपूर्ण बताया गया है.
Verse in focus
अत्यंत दुष्ट भी न बन, और न मूर्ख हो; तू क्यों अपने समय से पहले मरे?
verse in its chapter—contextual note
इस अध्याय के भीतर लेखक जीवन के अस्थायित्व, सच को समझने की कोशिश, और मानव व्यवहार के उतार-चढ़ाव को व्यंग्य-युक्त परंतु गंभीर शैली में प्रस्तुत करता है. यह verse एक प्रकार के नैतिक संयम और आत्म-निरीक्षण का आह्वान है—क्योंकि जीवन की अनिश्चितताओं के बीच भी विवेक और संयम से ही सफलता और शांति मिलती है.
मुख्य आध्यात्मिक शिक्षा
इस आयत की प्रमुख शिक्षा यह है कि जीवन स्तर पर असमान राहों से बचना चाहिए: दुष्टता और मूर्खता दोनों ही हमारे उद्देश्य—ईमानदारी, बुद्धिमानी, और समय का सही उपयोग—के प्रतिकूल हैं. समय प्रबंधन, धार्मिक आचरण, और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की प्रवृत्ति इस पाठ के केन्द्र में है. परमेश्वर के सामने जीवन को संतुलित रीत से जीना अपेक्षित है, ताकि हम अपने समय से पहले नाकाम न हों या संसार के भय से विचलित न हों.
पवित्र लेखन से तुलना—अनुदेश और संकेत
- नीतिवचन और अन्य पुस्तकों में भी विवेक, धैर्य, और तपस्या पर बल दिया गया है; यहाँ ये तत्व सभोपदेशक के आलोचनात्मक परिदृश्य के साथ जुड़ते हैं. मार्किन जैसे विचारक के समान, यह आयत चेतावनी देती है कि दुष्ट व्यवहार और मूर्खता जीवन की राह को खींचकर समाप्त कर दें, जबकि विवेक-संयम से जीवन बना रहता है.
- अन्य अध्यायों में समय और अवसर पर बल दिया गया है; यहाँ भी समय की चिंता में न तो अति दुष्ट बनना उचित है न ही अत्यंत मूर्ख होना—न्याय और सहनशीलता का संतुलन आवश्यक है.
2–3 cross-references (संयोगी संदर्भ) और संक्षिप्त स्पष्टीकरण
ये संदर्भ इस विचार को पुष्ट करते हैं कि जीवन के सफल मार्ग में विवेक, धैर्य, और संयम की भूमिका निर्णायक है.
व्यवहार-निष्कर्ष: कैसे लागू करें
सार-सार
सभोपदेशक 7:17 एक सरल लेकिन गहरा मनोभाव देता है: न तो अत्यंत दुष्ट बनना चाहिए, न मूर्खता की हद तक जाना चाहिए. विवेकपूर्ण जीवन—धर्मिक संयम और समय के सही उपयोग के साथ—यही मार्ग है ताकि जीवन में स्थिरता और शांति आए.
स्रोत-उद्धरण
यह पाठ चित्त की कसौटी पर विवेक और संयम की ओर इशारा करता है, जैसा कि पुरानी सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों के विचारों में भी मिलता है. उल्लेखित विचार-विस्तार में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के अनुसार: समानांतर धारणा है कि दुष्टता से बचना और मूर्तिमान विवेक बनाये रखना जीवन की सफलता के लिए आवश्यक है. (उद्धरण के तौर पर इन लेखकों के ठीक शब्दों के संक्षिप्त संकेत प्रदान किए जाते हैं; पूर्ण वाक्यों के उद्धरण यहाँ नहीं दिए गए हैं.)