Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
सभोपदेशक 7:1 सभोपदेशक 7:2 सभोपदेशक 7:3 सभोपदेशक 7:4 सभोपदेशक 7:5 सभोपदेशक 7:6 सभोपदेशक 7:7 सभोपदेशक 7:8 सभोपदेशक 7:9 सभोपदेशक 7:10 सभोपदेशक 7:11 सभोपदेशक 7:12 सभोपदेशक 7:13 सभोपदेशक 7:14 सभोपदेशक 7:15 सभोपदेशक 7:16 सभोपदेशक 7:17 सभोपदेशक 7:18 सभोपदेशक 7:19 सभोपदेशक 7:20 सभोपदेशक 7:21 सभोपदेशक 7:22 सभोपदेशक 7:23 सभोपदेशक 7:24 सभोपदेशक 7:25 सभोपदेशक 7:26 सभोपदेशक 7:27 सभोपदेशक 7:28 सभोपदेशक 7:29



सभोपदेशक 7:14 (HINIRV) — सुख और दुःख का संग-साथ
परिप्रेक्ष्य में यह verse युग-युग से मनुष्यों के अनुभव को छूता है: जीवन के सुखद दिनों में भी कभी-कभी अवसाद और मुस्कान के पीछे की वास्तविकताओं को समझना कठिन होता है, और विपरीत परिस्थितियों में भी ईश्वर की व्यवस्था का गहरा कारण खोजना पड़ता है। वेदोक्त विचार यहाँ यह कहता है कि परमेश्वर ने दोनों चरणों को साथ रखा है ताकि मनुष्य भविष्य की बातों को अस्पष्ट रहते हुए भी जी सके और आत्म-समझ का अभ्यास कर सके।
मुख्य सार और अर्थ
कहावत का केंद्रीय संदेश है: जीवन में सुख-समय और दुख-समय दोनों एक साथ रहते हैं, ताकि हमें अंततः यह न समझ में आए कि आने वाले दिनों में क्या होगा। परमेश्वर ने स्थिति-परिस्थितियाँ इस प्रकार बनाईं ताकि मनुष्य अपनी सीमाओं को समझे और भरोसे में रहें। यह न केवल परिस्थितियों की विविधता को स्वीकारने का विषय है, बल्कि परमेश्वर के नियंत्रण और न्याय-पूर्ण योजना पर अचूक विश्वास का आह्वान भी है।
तीन प्रमुख विषय
संदर्भित वचनों से सम्बन्ध
यह पंक्ति अन्य नीतिपरक शिक्षाओं से संगति बनाती है, जैसे कि एकांत-आह्वान में धैर्य और विवेक की महत्ता बताने वाले विचार। साथ ही, कुशलता से जीवन के विविध-परिस्थितियों में संतुलन बनाए रखने के लिए परमेश्वर के चुनावित उद्देश्य पर भरोसा रखने की प्रेरणा देता है।
संलग्न क्रॉस-रेफरेंस (संक्षिप्त):
इन संदर्भों के योग से स्पष्ट है कि दुख-समय और सुख-समय मिलकर जीवन-धारणा को गहराते हैं और परमेश्वर की सार्वभौमिक योजना को ग्रहण करने की आवश्यकता है।
व्यावहारिक चिंतन
आज के दिन आप अपने दैनिक अनुभवों में देखें: क्या आप सुख के क्षणों में भी परमेश्वर की दिशा पर विचार कर रहे हैं? और दुःख की घड़ियों में, क्या आप धैर्य बनाकर उसे एक पवित्र परीक्षण के रूप में स्वीकारते हैं? इस वचन का उद्देश्य है कि हम अपनी क्षणिक खुशी-या दर्द से ऊपर उठकर ईश्वर के स्थिर शासन पर नजर बनाए रखें, ताकि भविष्य की बातों पर अधिक सहज और विश्वासपूर्ण प्रतिक्रिया दे सकें।
संक्षेप
सभोपदेशक 7:14 यह बताता है कि सुख और दुःख दोनों ही एक साथ रहते हैं ताकि मनुष्य के भीतर ईश्वर-आस्था और विवेक विकसित हो सके। जीवन की अनिश्चितताओं के बीच, परमेश्वर की योजना पर अडिग विश्वास और धैर्य-सीढ़ी बनाए रखना ही सही उत्तर है।
परिचायक उद्धरण (संदर्भित सार्वजनिक डोमेन टिप्पणीकारों में से एकाधिक जगह मिली):
मैथ्यू हेनरी, Albert Barnes, Adam Clarke के सामान्य, सार्वजनिक-डोमेन विचारों से प्रेरित निष्कर्ष एकीकृत रूप में प्रस्तुत हैं। यदि किसी पंक्ति में उनके ठोस शब्द सीधे उद्धृत किए गए हों, तो नीचे उल्लेख किया गया है:
“Sorrow is a discipline for the soul, and joy is no licence to forget God.”
Note: उपरोक्त वाक्य उनके कार्यों के हल्के सार का प्रतिनिधित्व है और वास्तविक टेक्स्ट की पूर्ण उद्धरणावृत्ति के लिए मूल ग्रंथों के पाठ देखें।