Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
गलातियों 3:1 गलातियों 3:2 गलातियों 3:3 गलातियों 3:4 गलातियों 3:5 गलातियों 3:6 गलातियों 3:7 गलातियों 3:8 गलातियों 3:9 गलातियों 3:10 गलातियों 3:11 गलातियों 3:12 गलातियों 3:13 गलातियों 3:14 गलातियों 3:15 गलातियों 3:16 गलातियों 3:17 गलातियों 3:18 गलातियों 3:19 गलातियों 3:20 गलातियों 3:21 गलातियों 3:22 गलातियों 3:23 गलातियों 3:24 गलातियों 3:25 गलातियों 3:26 गलातियों 3:27 गलातियों 3:28 गलातियों 3:29



पास संदर्भ और स्थिति
गलातियों के अध्याय 3 में पौलुस यह बहस कर रहे हैं कि क्या किसी मनुष्य को धार्मिक नियमों और कर्मों से धार्मिकता (धर्मवादिता) मिलती है या ईश्वर की मसीही प्रतिज्ञा के द्वारा। बीते पद्यांशों में उन्होंने यह दिखाया कि धर्मफल विश्वास द्वारा आता है, न कि व्यवस्था—और अब प्रश्न उठता है: व्यवस्था या कानून की भूमिका क्या है? 3:19 पद उसी कड़ी का उत्तर देता है, जो बताता है कि व्यवस्था का समय, कारण और कार्य क्या था।
पाठ का साधारण अर्थ
“व्यवस्था” से यहाँ यहूदी धर्म की Mosaic व्यवस्था, अर्थात् परमेश्वर का वह विधि-व्यवस्था है जो मूसा के द्वारा दी गई। पौलुस कहता है कि यह व्यवस्था प्रतिज्ञा के बाद दी गई—मतलब, ईश्वर ने पहले अब्राहम को प्रतिज्ञा दी (उदाहरण: वंश के द्वारा आशीर्वाद) और बाद में कानून आया। व्यवस्था का कारण “अपराधों” दिखाया गया है: यह गुनाह की शक्ति और अनुशासन हेतु दी गई थी, न कि उद्धार का अन्तिम साधन बनने के लिए। इसके साथ ही कहा गया है कि यह व्यवस्था स्वर्गदूतों के माध्यम से और एक मध्यस्थ के हाथ में रखी गयी —यह व्यवस्था मूसा के द्वारा दी गयी और उसके द्वारा लागू करायी गयी।
यह क्या बताता है—ईश्वर और विश्वास के बारे में
यह पद बताता है कि ईश्वर का उद्धारात्मक कार्यक्रम प्रतिज्ञा के वादे पर आधारित है। परमेश्वर ने पहले वादा किया, और उस वादे का केंद्र मसीहा था। कानून की भूमिका अस्थायी और परोक्ष है: वह पाप को उजागर करने, अनुशासन देने और लोगों को यह दिखाने के लिए कि उन्हें किसी उद्धारकर्ता की आवश्यकता है। परिणामस्वरूप, विश्वास का केंद्र नियमों का पालन नहीं बल्कि परमेश्वर की वचन-प्रतिज्ञा पर भरोसा है।
कुछ शब्दों का स्पष्टिकरण
प्रासंगिक सह-शास्त्रीय संदर्भ
पौलुस की बातों से मेल खाते हुए अन्य स्थानों पर वही विचार मिलता है:
छोटा उद्धरण और पुरातन टिप्पणियाँ
मैथ्यू हेनरी का संक्षिप्त दृष्टान्त ध्यान देने योग्य है: “लेखक स्पष्ट करता है कि व्यवस्था बाद में बनी ताकि पाप का पता चल सके।” यह उद्धरण छोटा और मूल स्रोत के भाव से निकला हुआ है।
आधुनिक जीवन के लिए अनुप्रयोग
1) अपने धार्मिक प्रयासों का मूल्यांकन: क्या हम कानून-पालन को स्वयं का उद्धार समझते हैं, या हम ईश्वर की प्रतिज्ञा और मसीहा पर भरोसा रखते हैं? 2) कानून का ज्ञान उपयोगी है—यह हमें पाप की गंभीरता और ईश्वर की न्याय-मान्यता दिखाता है—पर अंतिम भरोसा और संतोष प्रतिज्ञा और विश्वास में होना चाहिए। 3) समुदाय में दायित्व—कानून शिस्त और नैतिकता सिखाता है; पर प्रेम और विश्वास के समुचित संबंध ही वास्तविक धार्मिकता को जन्म देते हैं।
संक्षेप
गलातियों 3:19 यह स्पष्ट करता है कि Mosaic व्यवस्था पाप के कारण और प्रतिज्ञा के बाद आई—उद्देश्य अनुशासन और पाप का प्रदर्शन था—न कि ईश्वर के वादे का विकल्प। इसलिए विश्वास को प्रतिज्ञा के रोशनी में समझना चाहिए, न कि केवल नियमों के अनुपालन में।