Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
अय्यूब 1 अय्यूब 2 अय्यूब 3 अय्यूब 4 अय्यूब 5 अय्यूब 6 अय्यूब 7 अय्यूब 8 अय्यूब 9 अय्यूब 10 अय्यूब 11 अय्यूब 12 अय्यूब 13 अय्यूब 14 अय्यूब 15 अय्यूब 16 अय्यूब 17 अय्यूब 18 अय्यूब 19 अय्यूब 20 अय्यूब 21 अय्यूब 22 अय्यूब 23 अय्यूब 24 अय्यूब 25 अय्यूब 26 अय्यूब 27 अय्यूब 28 अय्यूब 29 अय्यूब 30 अय्यूब 31 अय्यूब 32 अय्यूब 33 अय्यूब 34 अय्यूब 35 अय्यूब 36 अय्यूब 37 अय्यूब 38 अय्यूब 39 अय्यूब 40 अय्यूब 41 अय्यूब 42Verse
अय्यूब 13:1 अय्यूब 13:2 अय्यूब 13:3 अय्यूब 13:4 अय्यूब 13:5 अय्यूब 13:6 अय्यूब 13:7 अय्यूब 13:8 अय्यूब 13:9 अय्यूब 13:10 अय्यूब 13:11 अय्यूब 13:12 अय्यूब 13:13 अय्यूब 13:14 अय्यूब 13:15 अय्यूब 13:16 अय्यूब 13:17 अय्यूब 13:18 अय्यूब 13:19 अय्यूब 13:20 अय्यूब 13:21 अय्यूब 13:22 अय्यूब 13:23 अय्यूब 13:24 अय्यूब 13:25 अय्यूब 13:26 अय्यूब 13:27 अय्यूब 13:28



अय्यूब 13:20 के immediatesetting का परिचय
यह आयत अय्यूब के संवाद का वह क्षण है जब वह परमेश्वर से दो प्रमुख अनुरोध करता है: (1) तू मुझे दो ही चीजें न दे, ताकि मैं तेरे साथ निर्बद्ध रहूँ; (2) फिर मैं तुझ से नहीं छिपूँगा। यह भाव प्रस्तुत करता है कि विश्वासी की निष्ठा और विनम्रता कैसे एक साथ आती हैं—जो बात भगवान से खुलकर बातचीत की अनुमति मांगती है, वही असत्य और ढीलापन छोड़ने का आग्रह भी है।
पाठ का क्या संकेत देता है—ईश्वर और विश्वास के बारे में
इस वाक्य में अय्यूब भगवान के साथ एक सुलहपूर्ण और निर्भय संवाद चाहते हैं। वे चाहते हैं कि परमेश्वर उन्हें अधिकारपूर्वक निष्कर्ष तक न उठाकर सीधे मार्गदर्शन दें; और वे कहते हैं कि जब तक परमेश्वर इन दो चीजों को नहीं रोकते, तब तक वे छिपेंगे नहीं—यानी वे सच बोलने और निष्ठा के साथ प्रश्न पूछते रहेंगे। यह विश्वास की वास्तविकता को दर्शाता है: परमेश्वर के साथ ईमानदारीपूर्ण वार्ता में सफलता है, न कि परिशुद्धतावादी औपचारिकता में।
अर्थ स्पष्ट करना—लोकप्रिय शब्दों का अर्थ
“दो ही काम मुझसे न कर” में अय्यूब ईश्वर से यह मांग कर रहे हैं कि वे उन्हें अपने तथा स्वर्गीय क्रियाओं से मुक्त रखें—यानी वे चाहेंगे कि भगवान: 1) उनके ऊपर अत्यधिक दबाव न डालें, और 2) वे खुद भगवान के साथ खुलकर बोल सकें, बिना डर के।
संबंधित पद और उनके हल्के पारस्परिक संकेत
1) पवित्रता और स्पष्टता के लिए खुले संवाद की आवश्यकता—सेला 7:11-12 जैसे स्थान में भी यह संकेत मिलता है कि ईश्वर की साक्षीता स्पष्ट और सत्यापित होनी चाहिए।
2) विश्वास और कष्ट के बीच का संबंध—यही विचार अक्सर-imi-यौन अनुभवों में मिलता है कि परमेश्वर के निकटता में असहायता और धैर्य एक साथ आते हैं।
3) सत्य बोलने की शिक्षा—याद रहने योग्य है कि परमात्मा के सामने छिपना नहीं, बल्कि सत्य को कुबूल करना ही विश्वास का मार्ग है।
2-3 क्रॉस-रेफरेंसेस और उनका छोटा परिचय
इन उद्धरणों में से किसी का संक्षिप्त वाक्यांश: “ईश्वर के साथ सत्य और स्पष्ट संवाद ही वास्तविक विश्वास को मजबूत बनाते हैं।”
आज के संदर्भ में जीवन-प्रयोग
सार-सार में, अय्यूब 13:20 हमें यह प्रेरणा देता है कि परमेश्वर के साथ विश्वस्त और स्पष्ट संवाद ही विश्वास की वास्तविकता को गहरा करता है।