Old Testament
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अय्यूब 13:8 – क्या तुम उसका पक्षपात करोगे? और परमेश्वर के लिये मुकद्दमा चलाओगे।
यह पाठ अय्यूब के पलायन-आरोपों के बीच एक नीतिगत प्रश्न प्रस्तुत करता है: क्या लोग परमेश्वर के विरुद्ध दलील देकर अपने अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं? संदर्भ में अय्यूब इस थकान और पीड़ा से गुजर रहा है, और उसने अपने मित्रों के तर्कों के प्रत्यक्ष विपरीत एक सीधी याचना रखी है: परमेश्वर के विरुद्ध मुकद्दमा चला कर न जुटो, बल्कि उसकी निष्पक्षता और ज्ञान की मांग करो।
ईश्वर के बारे में जो पाठ दिखाता है
इस आयत के पीछे का विचार यह है कि परमेश्वर अयोग्य पक्षपात नहीं करता। अय्यूब यह संकेत देता है कि लोगों को ईश्वर के समक्ष तर्क करना चाहिए—परमेश्वर के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसकी न्याय-योग्यता और सही-न्याय के मार्ग को समझना चाहिए। यद्यपि अय्यूब दुख के कारण घबराहट में है, फिर भी उसने एक नैतिक चेतावनी दी कि ईश्वर का मुकद्दमा अपने लाभ के लिए नहीं चलाना चाहिए।
प्रमुख शब्दों और चित्रों का स्पष्टीकरण
सम्बन्धित आयतें (cross-references)
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि ईश्वर की न्याय-नीति मानव-जनित तर्कों से ऊपर है, और हमें उसकी परवाह से सत्य को चुनना चाहिए, न कि अपने-अपने हितसिद्धांतों को प्रमुख बनाना चाहिए।
पुराने समय के कटाक्ष- टिप्पणियाँ (contextual insights)
Matthew Henry, Albert Barnes, और Adam Clarke के चर्चित विचारों के साथ यह पंक्ति एक नैतिक चेतना को पुकारती है: मनुष्य को परमेश्वर के न्याय-निर्णय के आगे अपनी दलील केवल विनम्रता और सत्य के साथ प्रस्तुत करनी चाहिए, न कि अपने पक्ष में पक्षपातपूर्ण दलीलें बनाने की कोशिश। Henry का सार यह है कि परमेश्वर समान रूप से देखता है; Barnes कहते हैं कि मानव अनुभव के सामने भी ईश्वर की गहराई समझ से आगे नहीं बढ़ता; Clarke indikates कि पीड़ा के समय भी ईश्वर की परिकल्पना में निष्कपटता होनी चाहिए। इन टिप्पणियों का एक सरल निष्कर्ष यह है कि विश्वासियों को पथ-भटकाव से बचकर सत्याप्राप्त न्याय की खोज करनी चाहिए, न कि आत्म-केंद्रित तर्कों से।
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