Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
अय्यूब 1 अय्यूब 2 अय्यूब 3 अय्यूब 4 अय्यूब 5 अय्यूब 6 अय्यूब 7 अय्यूब 8 अय्यूब 9 अय्यूब 10 अय्यूब 11 अय्यूब 12 अय्यूब 13 अय्यूब 14 अय्यूब 15 अय्यूब 16 अय्यूब 17 अय्यूब 18 अय्यूब 19 अय्यूब 20 अय्यूब 21 अय्यूब 22 अय्यूब 23 अय्यूब 24 अय्यूब 25 अय्यूब 26 अय्यूब 27 अय्यूब 28 अय्यूब 29 अय्यूब 30 अय्यूब 31 अय्यूब 32 अय्यूब 33 अय्यूब 34 अय्यूब 35 अय्यूब 36 अय्यूब 37 अय्यूब 38 अय्यूब 39 अय्यूब 40 अय्यूब 41 अय्यूब 42



आय्यूब 14:7 का संदर्भ और अर्थ
इस पद में आय्यूब अपनी दयनीय स्थिति के बीच जीवित रहने की आशा की मिसाल दे रहा है। वृक्ष को काट डालने पर भी उसकी जड़ें जीवित रहती हैं और समय आने पर वह फिर पनप उठती है। यह दर्शाता है कि जीवन की आशा अक्सर विपत्ति के बीच भी दृढ़ रहती है, और परमेश्वर द्वारा बनाए गए चक्रों में पुनर्जीवन संभव है। यह कथन सीधे तौर पर मृत्यु-आशा के प्रश्न से जुड़ा है—क्या मनुष्य की गहरी पीड़ा के बाद भी जीवन की कोई संभावना बची रहती है?
मुख्य अर्थ
कथन यह संकेत देता है कि भले ही प्रकृति की तरह इंसान की अवस्था कितनी भी निष्क्रीय और क्षयशील क्यों न दिखाई दे, इक अवसर पर पुनर्जीवन संभव है। प्रभु के समय-समय पर दिए गए आशीर्वाद और जीवन के चक्र इस विचार को मजबूत करते हैं: क्रिया-प्रकृति में पुनःजीवन का क्रम है।
दो-तीन प्रमुख विषय
अन्य प्रासंगिक आयत-सम्भावनाएं
यही सोच अन्य स्थानों में भी उभरती है जहाँ निर्बल से भी जीवन निकल आता है, जैसे यीशु के उपकर्मों में पुनर्जीवन की संभावना का संकेत—जो विश्वासियों को पीड़ा के बीच स्थिर रहने का साहस देता है; यह भी स्मरण दिलाता है कि परमेश्वर की रचना में चक्र-आयाम हैं।
व्यावहारिक विचार
कठिन समय में भी आशा बनाए रखना dərm है- हमें चाहिये कि हम परमेश्वर की वादाओं पर ध्यान दें, अपने आंतरिक उत्तरदायित्व को निभाते रहें, और तब भी एक उम्मीद की किरण को जीवित रखें कि परिवर्तन संभव है। कमजोर पड़ते हुए भी आध्यात्मिक जीवन की चाबी धैर्य, प्रार्थना और समुदाय के साथ भागीदारी है।
गंभीर निष्कर्ष
यह आय्यूब का वाक्य हमें यह सिखाता है कि विपत्ति में भी जीवन के पुनर्जन्म की संभावना अदृश्य नहीं रहती; क्योंकि परमेश्वर की संरचना में हर काट-छाँट के बाद भी नयी डालियाँ निकलती हैं। यही विचार विश्वास की मजबूत नींव बनाते हैं—दृष्टि लंबे समय के लिए हो और दिल में आशा स्थिर रहे।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षिप्त)
रोम 8:24-25 में आशा का संदर्भ, और 1 कुरिन्थ 15 में पुनर्जीवन की दृढ़ स्थिति; यीशु के उद्धार की आशा से प्रेरित जीवन की निरन्तरता। इन संदर्भों में विचार मिलता है कि पीड़ा के बीच भी परमेश्वर के वचन से प्रेरित विश्वास जीवंत रहता है और अंततः उद्धार की पूर्णता आते-आते है।
मूल उद्धरण (Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke) उपलब्ध हो सकने वाले छोटे, विशिष्ट वक्तव्यों का शामिल संदर्भ—यथावश्यक—केवल आवश्यक हो तो उद्धृत किए जाएँगे.
नोट: नीचे दिए गए क्रॉस-रेफरेंसेस कृपया संक्षेप में समझिए; पूर्ण पदों का टेक्स्ट यहाँ नहीं दिया गया है ताकि पाठक संदर्भ का सार समझ सके।