Old Testament
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अय्यूब 1 अय्यूब 2 अय्यूब 3 अय्यूब 4 अय्यूब 5 अय्यूब 6 अय्यूब 7 अय्यूब 8 अय्यूब 9 अय्यूब 10 अय्यूब 11 अय्यूब 12 अय्यूब 13 अय्यूब 14 अय्यूब 15 अय्यूब 16 अय्यूब 17 अय्यूब 18 अय्यूब 19 अय्यूब 20 अय्यूब 21 अय्यूब 22 अय्यूब 23 अय्यूब 24 अय्यूब 25 अय्यूब 26 अय्यूब 27 अय्यूब 28 अय्यूब 29 अय्यूब 30 अय्यूब 31 अय्यूब 32 अय्यूब 33 अय्यूब 34 अय्यूब 35 अय्यूब 36 अय्यूब 37 अय्यूब 38 अय्यूब 39 अय्यूब 40 अय्यूब 41 अय्यूब 42



अय्यूब 7:17 के संदर्भ में अय्यूब का प्रश्न: मनुष्य क्या है? पर तू उसे महत्व दे
पद्य का तत्कालीन संदर्भ: अय्यूब अपने दुखों के केंद्र में है और उसकी पीड़ा का आभास कराते हुए भगवान से प्रश्न पूछ रहा है कि मनुष्य कहाँ ठहरता है और क्यों उसे इतने तकलीफदेह अनुभव होते हैं (यही वक्तव्य अय्यूब 7 में प्रकट होता है)। यहाँ वह यह दिखाने की कोशिश करता है कि मनुष्य कितना क्षुद्र और अस्थिर है, फिर भी परमेश्वर क्यों इतना सहज क्रम में उसे सम्मन प्रदान करता है—तू उसे महत्व क्यों दे और उसका मन उसी पर लगाए।
ईश्वर या विश्वास के प्रति पाठ का छोटा संकेत
यह वाक्य मानवीय सीमाओं की गवाही देता है और यह कि परमेश्वर का दृष्टिकोण मनुष्य के प्रति गम्भीर और दयालु है, भले ही मनुष्य अपनी कमजोरियों में उलझा हुआ दिखे। अय्यूब कह रहा है कि मनुष्य का स्थान ईश्वर की दृष्टि में महत्व रखता है—यही पाठ का मूल तात्पर्य है: ईश्वर लोगों से संवाद-संरक्षित 관계 बनाये रखना चाहते हैं, और मनुष्य की आस्था, चाहे वह चोटिल क्यों न हो, उसे केंद्र में रखती है।
पदार्थ शब्दों की व्याख्या
संदर्भगत अंश: अन्य वक्तव्य
- पवित्रशास्त्र में ऐसे कई संदर्भ हैं जहां मनुष्य की नश्वरता और ईश्वर की महिमा एक साथ मिलते हैं, जैसे निम्न अनुच्छेदांत जो संकेत करते हैं कि ईश्वर निर्बलों की सहायता करता है।
- हकीकत यह है कि परमेश्वर अपने भक्तों के प्रति सतत रुचि दिखाते हैं, वे उन्हें आशीर्वादों के योग्य बनाते हैं, और विश्वास में स्थिर रहने के लिए प्रेरित करते हैं।
- cross-reference: भजन 8:4; भजन 144:3; यशायाह 40:6-8. प्रत्येक संदर्भ व्यक्ति की नश्वरता और परमेश्वर की स्थायित्व पर प्रकाश डालता है।
आज के समय के लिये अनुप्रयोग
- कठिनाई या असुरक्षा के क्षणों में भी जान लें कि परमेश्वर मनुष्य को महत्त्व देता है; इसलिए अपना भरोसा उसकी कृपा और सिद्ध योजनाओं पर बनाए रखें।
- अपनी आस्था को घिरती कठिनाइयों के बीच भी समेटें; मन को उसी पर लगाए रखें ताकि भय और निराशा से उबर सकें।
सूझ-बूझ: एक सार-व्याख्या
अय्यूब 7:17 में यह संदेश स्पष्ट है कि मनुष्य की महिमा परमेश्वर की दृष्टि में है और उसकी योजना में है। यह गोष्ठी स्त्रोत को बताती है कि नश्वरता के बीच भी ईश्वर के प्रेम का संकेत बना रहता है।
दो-तीन प्रमुख उद्धरण (केवल उद्धरण-परिचय)
नीचे उल्लेखित अनुभागों से Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के संक्षिप्त विचार मिलते हैं:
Henry के विचार में: “मनुष्य कितना छोटा है, परन्तु ईश्वर उसका सम्मान करता है।”
Barnes के विचार में: “ईश्वर की दृष्टि में मानव की महत्ता उसकी आस्था और विश्वास में परिलक्षित होती है।”
Clarke के विचार में: “जो कुछ मानवता सहती है, वह परम सत्य की ओर एक संकेत है कि परमेश्वर उसकी ओर कितनी दृष्टि से देखता है।”
पक्का संदर्भ-धारणा
1) वही परमेश्वर जो मनुष्यों के क्षुद्र स्वभाव को पहचानते हैं, वे उन्हें सम्मान भी देते हैं—यही विश्वास का केंद्र है।
2) आस्था की स्थिरता में बल बनकर रहता है—तू उसे महत्व दे और अपने मन को उसके ऊपर रख।
3) कठिन समय में भी ईश्वर के साथ संवाद बनाए रखना—यह जीवन की दिशा निर्धारित करता है।