Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीइब्रानियों 2:6 बाइबल पद की व्याख्या
इब्रानियों 2:6 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
वरन् किसी ने कहीं, यह गवाही दी है, “मनुष्य क्या है, कि तू उसकी सुधि लेता है? या मनुष्य का पुत्र क्या है, कि तू उस पर दृष्टि करता है?
इब्रानियों 2:6 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
इब्रानियों 2:6 समानांतर पद और संबंधित वचन
उन बाइबल पदों को देखें जो विषय, शिक्षा या संदर्भ के आधार पर इस अंश से जुड़े हैं। समानांतर पदों की तुलना करने से इस वचन के संदर्भ और संदेश को अधिक गहराई से समझने में सहायता मिलती है। किसी चित्र को चुनें और संबंधित पद, उसकी व्याख्या तथा पद-दर-पद बाइबल टीका देखें।

भजन संहिता 8:4 (HINIRV) »
तो फिर मनुष्य क्या है* कि तू उसका स्मरण रखे, और आदमी क्या है कि तू उसकी सुधि ले?

भजन संहिता 144:3 (HINIRV) »
हे यहोवा, मनुष्य क्या है कि तू उसकी सुधि लेता है, या आदमी क्या है कि तू उसकी कुछ चिन्ता करता है?

यह वाक्य क्या बताता है
इब्रानियों 2:6 में एक गवाही उद्धृत है जो मानव की स्थिति और परमेश्वर की दृष्टि के पारस्परिक संबंध को सामने लाती है: “मनुष्य क्या है, कि तू उसकी सुधि लेता है? या मनुष्य का पुत्र क्या है, कि तू उस पर दृष्टि करता है?” यहाँ दर्शाया गया है कि संसार-सृष्टी के भीतर मनुष्य कितनी निहायत अहमियत रखता है, पर परमेश्वर की सामर्थ्य और महिमा एक प्रकार की असीमिता में है जिसकी तुलना मनुष्य से नहीं की जा सकती। यह पाठ विशेषकर यीशु मसीह के पद-चयन और मानव-जीवन के अर्थ की ओर एक आशावादी संकेत है, जहाँ यह भी संकेत देता है कि ईश्वर हमारी सुध लेते हैं ताकि हम उद्धार पाएं।
प्रसंगिक पृष्ठभूमि
पत्र के लेखक यह दर्शाते हैं कि रवैया और कर्तव्य के रूप में जो उच्च प्रतिष्ठा ईश्वर ने मनुष्य को दी है, वह यीशु के माध्यम से पूर्ण होती है। पुराने नियम के अनुभवों के साथ तुलना करते हुए इस गवाही का उद्देश्य यह है कि मसीह के अवतार और उनके दया-प्रिय कृत्य से मनुष्य की स्थिति एक नई रोशनी में स्पष्ट होती है—कि परमेश्वर ने मानवता के साथ संबंध बनाये रखने के लिए मनुष्य की सुध ली और उसे अपने राज-कार्य में भागीदार बनाया।
interpretive observations
2–3 प्रमुख क्रॉस-रेफरेंसेस और उनके संक्षिप्त अर्थ
• 1 से 4 पंक्तियाँ के उद्धरण के साथ—ईसा के मानवीय अनुभव पर प्रकाश डालता है कि कैसे वह हमारी कमजोरियों के साथ जुड़ते हैं, ताकि हम उनके द्वारा उद्धार पाएं।
• कुरिन्थियों 1:25-27—जो विचित्र सामर्थ्य मानव में नहीं, पर ईश्वर के शक्ति-उल्लास में पाई जाती है; इससे यह विचार मजबूत होता है कि ईश्वर मानव-स्थिति को उद्धार के उच्चतम अवसर के रूप में देखते हैं।
• मत्ती 11:28—यही संदेश कि मसीह अपने शिष्यों को देह-भार से मुक्त करने के लिए आते हैं; यह गवाही इस उद्धार के मार्ग को स्पष्ट करती है।
छोटी थीम-वर्गीकरण
ज्ञात उद्धरण और उनसे निष्कर्ष
यहाँ लेखक समूह से मिलती प्रेरणा है—“मनुष्य क्या है, कि तू उसकी सुधि लेता है?”—जो हमें यह स्मरण कराती है कि परमेश्वर की कृपा मनुष्य की निश्चल चिंता को भी केंद्र में रखती है।
स्वाध्याय के लिए उपयोगी पंक्तियाँ: उद्धार, दया और मानव-स्थिति के बीच संतुलन समझाने वाले विचार।
संरचना-सारांश और व्यावहारिक उपयोग
ईश्वर मनुष्य के प्रति अत्यंत दयालु हैं और उनकी सुध लेते हैं। यह विचार केवल विचारणीय नहीं है, बल्कि प्रतिदिन के विश्वास-जीवन में सुरक्षा और आशा देता है। अपने कठिन समय में विश्वास रखें कि परमेश्वर हमें छोड़ते नहीं—बल्कि हमे अपने आप से ऊपर उठकर जीवन-यात्रा में मार्गदर्शित करते हैं।
कम-सीमा उद्धरण: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के पेड-परिशीलनों से आवश्यक विचार-चिन्ह उद्धृत किए जा सकते हैं; अन्यथा यहाँ स्पष्ट उद्धरण पूरी तरह से नहीं दिए गए हैं ताकि मूल पाठ का सम्मान बना रहे।