Old Testament
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इब्रानियों 2:10 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्योंकि जिसके लिये सब कुछ है, और जिसके द्वारा सब कुछ है, उसे यही अच्छा लगा कि जब वह बहुत से पुत्रों को महिमा में पहुँचाए, तो उनके उद्धार के कर्ता को दुःख उठाने के द्वारा सिद्ध करे।
इब्रानियों 2:10 पद-दर-पद बाइबल टीका
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इब्रानियों 2:10 समानांतर पद और संबंधित वचन
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रोमियों 11:36 (HINIRV) »
क्योंकि उसकी ओर से, और उसी के द्वारा, और उसी के लिये सब कुछ है: उसकी महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन।

इब्रानियों 12:2 (HINIRV) »
और विश्वास के कर्ता और सिद्ध करनेवाले* यीशु की ओर ताकते रहें; जिस ने उस आनन्द के लिये जो उसके आगे धरा था, लज्जा की कुछ चिन्ता न करके, क्रूस का दुःख सहा; और सिंहासन पर परमेश्वर के दाहिने जा बैठा। (1 पत. 2:23-24, तीतु. 2:13-14)

लूका 24:46 (HINIRV) »
और उनसे कहा, “यह लिखा है कि मसीह दुःख उठाएगा, और तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठेगा, (यशा. 53:5, लूका 24:7)
इब्रानियों 2:10 पर व्याख्या
पवित्र शिक्षा के सन्दर्भ में यह पद यीशु मसीह के उद्धारकार्य के प्रेरक उद्देश्य को सामने रखता है। इब्रानियों का लेखक कलीसिया और सृष्टि के उद्धारक के रूप में यीशु के महिमामय कार्य को परमेश्वर के योजनाबद्ध क्रम के भीतर देखते हैं: वह हर बात के आरम्भकर्ता नहीं, बल्कि “बहुत से पुत्रों को महिमा में पहुँचाने” के लिए उनकी उद्धार-यात्रा का मार्ग प्रशस्त करते हैं। यह वाक्य विशेष रूप से उन दुखों को देखते हुए लिखा गया है जो उद्धारकर्ता को सहने पड़े, ताकि वह महान दया और साक्षात्कार के द्वारा उद्धार के कर्ता के रूप में सिद्ध हो सके।
मुख्य अर्थ
यह वाक्य दो प्रमुख विचारों को जोड़ता है: पहले, उद्धार के लिए यह योजना परमेश्वर के पहले से निर्धारित प्रेम-कार्य का हिस्सा है; दूसरे, इस योजना के अनुसार यीशु को दुख उठाकर महिमा के चरणों तक पहुँचना पड़ा। उद्धारकर्ता के दुखों में ईश्वर की योग्यता और कृपा दिखती है—क्योंकि वे दुख केवल दण्ड नहीं, बल्कि पवित्र परीक्षा और उद्धार की प्रक्रिया हैं, जो विश्वास के मार्ग को सिद्ध करते हैं।
मुख्य विषय
संबद्ध पदों के सन्दर्भ
1) याकूब 1:2-4 में विश्वास के परीक्षा के परिणामस्वरूप धारणा बदलती है, जो यहां उद्धारकर्ता के Trials से प्रेरित महिमा का पूर्व-आह्वान देती है।
2) रोम 8:17-18 में यह विचार आता है कि क्राय-दान और पीड़ा के साथ भी परमेश्वर की महिमा साझी है, और जीवन की मशक्कतों में भी उस महिमा का दर्शन होता है।
3) फिलिप्पियों 2:8-11 में यीशु के विनम्रता और त्याग से उद्धार-योजना की पूर्णता स्पष्ट होती है, जो महिमा के साथ उसकी अधिकारिता का कारण बनती है।
व्यावहारिक विचार
हम अपने दुख-यातनाओं के समय यह समझें कि परमेश्वर की उद्धार-योजना में हमारी सहभागिता भी है। जीवन के कष्ट कभी-कभी हमारी आस्था को घटाने के बजाय उसे मजबूत बनाते हैं, जिससेहम उनके द्वारा महिमा के विरुद्ध नहीं, बल्कि उनके साथ सहयात्री बनकर जीते हैं। विश्वास में रहने की कसौटी यह है कि संकट के बीच भी हम परमेश्वर के कार्य को देखते रहें और उद्धार के सही परिप्रेक्ष्य को बनाए रखें।
संक्षेप
यह पद हमें बताता है कि उद्धारकर्ता यीशु ने दुःख उठाकर और विश्वास के मार्ग पर चलते हुए महिमा में प्रवेश पाया, ताकि वह उन बहुतेरे पुत्रों के उद्धार के कर्ता बनें जिनकी महिमा में उनके उद्धार की पूर्णता प्रदर्शित हो। परमेश्वर की योजनाओं के अनुरूप, क्लेश भी आदर्श दिखाते हैं कि कैसे ईसा मसीह के योग्य पथ से उद्धार संभव हुआ।
पूर्व-उद्धृत टिप्पणियाँ
Matthew Henry के विचारों के अनुरोध पर संक्षिप्त, पवित्रता और उद्धार-कार्य के सुसंगत रेखाचित्र नीचे मिलते हैं: “यद्यपि उनके दुःख भारी थे, परन्तु वे हमारे उद्धार के लिए थे।” (संकेतित संक्षेप) Albert Barnes के अनुसार, यह दुःख का काल यीशु की पूर्ण-निर्गमत्ता का प्रमाण है, और Adam Clarke के अनुसार, यह क्रिया परमेश्वर के सम्मान-प्रकाश को प्रकाशित करती है।