Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
रोमियों 11:1 रोमियों 11:2 रोमियों 11:3 रोमियों 11:4 रोमियों 11:5 रोमियों 11:6 रोमियों 11:7 रोमियों 11:8 रोमियों 11:9 रोमियों 11:10 रोमियों 11:11 रोमियों 11:12 रोमियों 11:13 रोमियों 11:14 रोमियों 11:15 रोमियों 11:16 रोमियों 11:17 रोमियों 11:18 रोमियों 11:19 रोमियों 11:20 रोमियों 11:21 रोमियों 11:22 रोमियों 11:23 रोमियों 11:24 रोमियों 11:25 रोमियों 11:26 रोमियों 11:27 रोमियों 11:28 रोमियों 11:29 रोमियों 11:30 रोमियों 11:31 रोमियों 11:32 रोमियों 11:33 रोमियों 11:34 रोमियों 11:35 रोमियों 11:36



रोमियों 11:36 का संकल्पना-आख्यान (HINIRV)
पैराग्राफिक रूप से इस पद का संदर्भ रोमियों के अध्याय 11 में परमेश्वर की योजना के स्थायित्व और उसके उद्देश्य की पूर्ण निर्भरता से जुड़ा है। प्रेरित पौলुस ने यह दर्शाने के लिए इस अध्याय में यह निष्कर्ष किया है कि यह प्रचारित-प्रचारित ईश्वर की महिमा, उसकी स्रष्टि और उद्धार की योजना एक अखंड समन्वय में चलता है। इस विशेष वाक्य में “उसकी ओर से, और उसी के द्वारा, और उसी के लिये सब कुछ है” से यह स्पष्ट होता है कि सारी चीजें—सम्पादन, प्रेरणा, और परिणाम—तीनों में परमेश्वर की भूमिका एक समान महत्त्वपूर्ण है, और उसके without- Him कुछ वास्तविक योगदान नहीं है।
मुख्य अर्थ
इस पद का मूल संदेश एक अलौकिक एकता को दर्शाता है: परमेश्वर ही सब की स्रोत है, सब उसी से निकलता है, और सब उसी के लिये किया जाता है। महिमा एक बार नहीं, बल्कि हर अवस्था में—युगानुयुग तक—उसके प्रचार, उसकी कृपा, और उसकी न्याय के कारण स्थिर रहती है। यह विचार भक्ति-योजना के पूर्णत्व पर जोर देता है: ईश्वर के लिए, ईश्वर द्वारा, और ईश्वर के लिए बनी हर योजना का केंद्र वही है।
मुख्य थीम
प्रत्यक्ष पंछीक्रम (Cross-references)
1) कृपया धर्म-वाक्यों से प्रेरित विचार: पृथ्वी और संसार के संचालन में ईश्वर का प्रमुख भाग—अन्य आयामहरूको साथ समरसता। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर की महिमा और उसकी योजना एकांतिक नहीं है, बल्कि सभी चीजों के अनुसार है।
2) ईश्वर की शक्ति और प्रतिष्ठान: कुछ क्षेत्रों में ईश्वर की महिमा और उसकी सत्ता का स्थायित्व दिखाया गया है—यह बताता है कि उद्धार भी उसी के हाथों और उसी के उद्देश्य से है।
3) उद्धार-योजना की पूर्णता: उसकी महिमा युगों-युगों तक बनी रहती है, और इस में यीशु मसीह की केंद्रीयता साफ निकलती है।
व्यावहारिक मनन
इस verse से प्राप्त सीख यह है कि हमारे जीवन में हर कार्य और विचार परमेश्वर के पहले से निर्धारित उद्देश्य के द्वारा संचालित होते हैं। हम चिंताओं में उलझें तो याद रखिए: सब कुछ उसे से, उसके द्वारा और उसके लिए किया जाता है। हमारी आस्था, आशा और प्रेम—तीनों का केंद्र उसी में रखना चाहिए। निर्भरता और विनम्रता के साथ हम उसकी महिमा को प्रमाणित करें, न कि अपने गरूर को।
संक्षिप्त समापन
रोमियों 11:36 में पौलुस ईश्वर की एकता-योजना की गहराई को उद्घाटित करते हैं: सब कुछ उसकी ओर से, उसी के द्वारा, और उसके लिये—और उसकी महिमा युगानुयुग बनी रहे। इस तथ्य पर स्थिर विश्वास से हमारा जीवन संतोष और भक्ति से भरा रहे।
नोट्स और उद्धरण-चिह्न (Public-domain commentary से संकेत)
प्रस्तुत व्याख्या में मध्यस्थ संदर्भ के लिए सामान्य-प्रचलित सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणियों के प्रेरक उपचारों को समाहित किया गया है। यदि किसी विशेष पंक्ति के लिए Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के स्पष्ट उद्धरण मिलते हैं, उनकी संक्षिप्त शब्द-संदर्भ नीचे सीधे नहीं दिया गया है, परन्तु उनकी प्रवृत्ति और तर्ज के अनुरूप विचारों का समावेश हुआ है।